"जो लोग जान बूझ के नादान बन गये,
हिंदुओं के अपमान कर ‘ताण्डव’ बना गये।
हम हश्र में गये मगर कुछ न पूछिये,
वो जान बूझ कर वहाँ अन्जान बन गये।
हँसते हैं हम को देख के अर्बाब-ए-आगही,
हम आप की मिज़ाज की पहचान बन गये।
मझधार तक पहुँचना तो हिम्मत की बात थी,
साहिल के आस - पास ही तूफ़ान बन गये।
इन्सानियत की बात तो इतनी सी है शेख़ जी
ख़ुदपरस्त लोग किसानों के मसीहा बन गये।
काँटे बहुत थे दामन-ए-फ़ितरत में यारो,
कुछ फूल और कुछ मेरे अरमान बन गये।"
Courtesy ~ Pannalal Roy ji.