मैंने तुम्हें ठीक कहा था
गहन वन में चल सकूँगा,
सब से आगे बह सकूँगा,
अपने मन की बात बताकर
सबके आगे खुला करूँगा।
चिट्ठी पढ़कर सन्तुष्ट रहूँगा
संदेशों में पड़ा रहूँगा,
हवा चली तो उड़ा करूँगा
हर राह पर हरा मिलूँगा।
शिखर अपने चुन लूँगा
क्षितिजों से अच्छा दिखा करूँगा,
पृष्ठों पर लिखा रहूँगा
सुखद मिलन की बात करूँगा।
चल कर भी अचल रहूँगा
कह कर भी अनकहा रहूँगा,
सुन कर भी अनसुना मिलूँगा
ज्ञात होकर अज्ञात रहूँगा।
**महेश रौतेला