कलेश
बहुत दिन चला, दिल और दिमाग के बिच यह कलेश;
फिर भी, कोशिशों के बावजूद, कट गये मेरे लंबे,घनेरे केश ;
नानी, आपको दिया वचन निभा न सकी, इस लिये पहोची है दिल को ठेस ।
हाय, बड़ी बेबसी में, काटने पडे मुझे, मेरे यह लम्बे केश ।
आज तक समज नहीं आता है, यह हुआ क्यु और कैसे !
मानो कोई काला जादु किया हो किसिने जैसे !
क्या इसी तरह जिवनभर, आता रहेगा जिवन में कलेश यूँही?
मानो मानव रचा ही गया हो कलेशो के साथ लड़ने, झुंझने ऐसे !
दाता, जिवन में क्यु आती है इतनी कठिनाइयाँ , दिन रात
यह कैसी विडंबना, यह, आपकी तरफ से, कैसी सौगात
ऐसे खिलौने रचके, आखिर इरादा क्या है; समजमें न आये यह बात ।
कब आ के बतायेगा तु मुझे, क्यूँ रची तुने यह अजीबोगरीब मानव जात?
Armin Dutia Motashaw