उठता है कदम मंजिल की तरफ़ पर जाये कहाँ मालूम नहीं
है टूट चली साँसों की लड़ी थम जाये कहाँ मालूम नहीं
दिल सागर में यादों की लहर उठती है कि जैसे ज्वार उठे
मुँह फेर लिया जब चन्दा में गिर जाये कहाँ मालूम नहीं
निकले थे बहारों की खातिर जा पहुँचे पर पतझारों में
फूलों की महक चिड़ियों की चहक भरमाये कहाँ मालूम नहीं
रंजना वर्मा