हम औरतें होती हैं दूब घास सी,
सूख जाती हैं संघर्ष तपन से,
जी उठती हैं थोड़ी खुशी के ही फुहार से,
अपनों के लिए अथक प्रयासरत,
हरसंभव प्रयत्न उनके सुकून के लिए,
खुद के लिए बिल्कुल बेपरवाह।
उपाधि गृहलक्ष्मी, फिर भी वंचित,
पूजा की थाली में महत्वपूर्ण,
जरा सा सर उठाते ही स्व स्वप्न, कद,
विचरने वालों को भाने वाली,
उद्यान में बढ़ती दूब सी
काट दी जाती हैं,
क्योंकि हम औरतें होती हैं दूब घास सी।
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