सिसक सिसक कर आहें भी जख्म भर रही है,
कोन जाने किसकी खताए महोब्बत में रोने लगी है,
मंदिर मस्जिद ये भी तो डरते हुवे दिख रहे है,
लगता है दुआ में कसक इश्क़ की खुदा से माँगी है,
सुलग कर ये ठंड का मौसम से जहां में बारिश की नमी है,
कुदरत में फुर्सत सी हवाओं में आज महबूब की कुछ कमी है।
ये सफ़र कुछ सुख कर बंजर जमी की तरह फैले से है,
किसी दिल के जख्म जोर सोर से निगाहों के किनारे ऑंसू में बह रहे है,
रो रो कर चुप चाप से बैठे है वारदात इश्क़ के फ़साने,
लगता है अफ़वा ए कश्मकश दिल की सारे जहां में रोने लगी है,
उलफ्त ए नजारे में दिखाई दे रही मंजिल खफा हो रही लगती है,
कहीं वफाई के सिलसिले देते देते खुद ही अंदर से टूट कर चूर हो रहे है,
बहलाने के लिए दिल के अरमान को कुछ रशमे रिवाज कर रही है,
शौक सभा की तरह हर गम मेरे सिने से लिपट कर रोने लगी है।
DEAR ZINDAGI 💞