फैसला
सोच रही हुँ थोड़ा बदल के देखूँ
फर्ज़ के क़ैद से निकल कर देखूँ |
बोहोत सहलिया वक़्त की मनमानी,
अब थोड़ा उसके बार से संभलकर देखूँ ||
उलझती हुई जीबन को सरल बनाकर देखूँ,
सैर करली गुमनामी की अँधेरी गलियोँ में बोहोत
अब थोड़ा उजाले में पहचान बनाकर देखूँ
सरझूका कर सहलिया बोहोत, सोच रही हुँ
थोड़ा बगाबत कर के देखूँ |||
सिखने को मिलता हे सबक ज़िन्दगी का ,
मैं मतलबी लोगों के साथ कुछ पल ठहर कर देखूँ |||
सुना हे वक़्त भरदेता हे हर जख्म
में भी एक आध चोट खाकर देखूँ |||||