एक त्रासदी है सब खत्म होने के बाद संबध जन्मदिन के तरीख में बचा होता है। जो हमें याद रह जाता है। कभी-कभी जन्मदिन बधाई देना अदालत में पेश देने जैसा लगाता है। एक दिन पेशी देने के बाद हम फिर बाइज्जत बरी हो जाते है। लंबा वक्त साथ बिताने के बावजुद कभी खुश और दुख में वह संबध शामिल ना रहा। दफ्तर में काम करते वक्त एक अजीब से बैचने होने लगी। कि उसे कैसे विश करू? यह सोचते ही घड़कने बढ़ने लगी। बैचने काे खत्म करने मैनें लंबा मैसेज लिखकर उसे भेज दिया। मैसेज पढ़कर उसने जवाब में बहुत कुछ कहा डाला। इसकी शायद उम्मीद नहीं थी। उसके शब्दों में दिखाई दे रहा था, वह मुझे दुखी देखना और करना नहीं चाहती और गलती का एहसास हाेने के बाद ना मुझे खुशी देना चाहती है। अपने जन्मदिन में दो सालों कभी मैंने जवाब नहीं दिया। उसकों मैंसेज करना एक प्यासा पेड़ को पानी देने जैसा था। पानी पाते ही थोड़ी देर बाद उसी जड़े फैलने लगी और वह मुझ तक पहुंचने प्रयास करने लगा। उस पेड़ को पानी देने के बाद एक अजीब सी ग्लानी महसूस हाेने लगी। खुद से कह रहा था, इस पेड़ को मुझे पानी नहीं देता। अब यह फिर बढ़ने लगा है, लेकिन इसे जीवन में शामिल करने कोई जगह नहीं बची। अगर इसे रखना पड़ा तो जीवन का एक हिस्सा मुझसे नाराज हो जाएगा। इस वक्त अपने सपनों और मेहनत के बारे में सोच रहा था जो मेरे साथ जुड़े हुए। उसके जवाब पढने के बाद आंखों में टीस थी। शायद इस वक्त पेड़ी को जगह देने का विचार कर रहा था। तभी अचाकर मैंने फिर सब खत्म करना चाहा और अलविदा कहकर बात खत्म करना किया। उसने अलिवाद शब्द पर दुख व्यक्त किया। मेरी संवेदनाएं उसके प्रति बढ़ने लगी थी। मैंने सारा मैंसेज डीलिट कर दिया मानों मेरे जीवन से उस पेड़ को निकाल दिया जिसकी जड़े फिर एक जगह बनाने में लगी हुई थी। कुछ देर तक शांत रहा फिर कहां मुझे लेखक बनना है इसकी आवाज अंदर में तेजी से झुंजने लगी जैसे खाली घर में चिल्लाने से झुजने लगी है। कुछ समय में वर्तमान साल भर पहले पहुंच गया था, फिर लौटने भी ज्यादा वक्त नहीं लगा। मैंन अपने काम में व्यस्त हो गया जैसे पहली किया था खत्म होने पर।