My New Poem ....!!!!
जहाँ अपने तक भी साथ छोड़ जाते है
वहाँ हमने ख़ुद को अपने साथ देखा है
वक़्त आने पे साया भी साथ छोड़ जाता हैं
वही पे हमने हम-साया अपना साथ देखा है
गिला-शिकवा औरों से लोग करते रहते है
हमने तो अपने-आपसे ही समझौते किएँ है
जीदगीं की राह में उतार-चढ़ाव तो पड़ाव है
हालातों के मद्देनज़र स्वीकार जीदगीं की है
दुश्वारियाँ भी चुनौतीपूर्ण अंदाज़ेसे परखी है
हमने काँटों भरी राहों को ही चुन डगर पाईं है
आसान तो हरगिज़ नहीं चने लोहे के चबाना
पर टक्कर हमने भँवरके हर चक्कर से ली है
इस्तेमाल कर फेंक देना तो जहाँका दस्तूर है
हमने परेशान हालातोंमें भी दस्तूर निभाया है
हर दौर के बूझुगोँ का शुक्र-गुज़ारी फ़न रहा
बूझुगँ तो नहीं पर शुक्र-गुज़ारी अमल रहा है
कहते हैं उम्र के आख़री दौरमें दवाएँ साथी है
उस दौरमें प्रभु-शरणसे द्वार बंध दवा के है।
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