हमारे राम
राम हमारे सच हैं
जो त्रेता से अब तक
हमारे बीच रहे हैं।
प्रबुद्ध जनों के पूज्यनीय
मर्यादा की पीढ़ी पर खड़े
मानस की शान्ति के लिए
आवश्यक हैं।
सच को रचे हैं
सच के साथ चले हैं,
प्यार की भूमिका में
सदा खड़े मिले हैं।
बुराई को मारते
धनुष-बाण लिए,
शालीन-संयत लगे हैं।
राम हमारी कथा रहे हैं
अयोध्या में खेलते
वन में जाते,
लंका में लड़ते
पुरुषोत्तम लगते हैं।
सुख और दुख की कथा
बार-बार कहते हुए,
हम में बसे होते हैं।
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**महेश रौतेला