इसी मनुष्य की विभा सूर्य सी चमकती,
इसी मनुष्य की तृष्णा, समुद्र सी उछलती,
यही मनुष्य देव है, जब बुद्ध तक आ गया,
इसी मनुष्य की प्रभा, धरा का अभिमान है।
पुरुषार्थ के लिए बनी पवित्र यह धरा है,
आनन्द का, शोक का अमृत-विष यहाँ है,
प्यार के बने हुए, ऊँचे जन्म-स्थल हैं,
ज्ञान के प्रकाश की ध्वनि धरा में व्याप्त है।
मनुष्य ने जो कहा वही उसका गीत है,
मनुष्य की दया में लौटता विधान है,
बँटता-बिखरता मनुष्य का संसार है,
लोक से परलोक तक मनुष्य की आवाज है,
इसी मनुष्य की विभा सूर्य सी चमकती।
**महेश रौतेला