खोखले होते रिश्ते(लघुकथा)
"काजल कह रही थी,शनिवार को चली जा।एक दिन औऱ मिल जायेगा"
मै सम्मान समारोह मे भाग लेने दिनेशपुर जा रहा था।बस मे मेरी बगलवाली सीट पर एक युवती बैठी थी।वह होली पर घर जा रही थी।वह मोबाइल पर अपनी सहेली से बातें कर रही थी।
"तो चली जाती, गयी क्यो नहीं?
"कया करती जाकर?तीन दिन रहूँगी घरवालों के साथ।बहुत है।"वह बोली"वहां जाकर बोर होती, यहां दोस्तों के साथ खूब एन्नजाय किया--मस्ती की"
उस युवती की बात सुनकर मैं सोचने लगा।औलाद के दूर रहने पर मां बाप हरपल चिंतित रहते है।और आजकल के बच्चे?