खर्च होता मैं
---------------
मैं खर्च हो रहा हूँ
जैसे मुट्ठी से खर्च होती है रेत
धीरे-धीरे
जैसे एक एक करके
उड़ जाते हैं सारे के सारे
कबूतर मेरी छत से
एक दो तीन चार करते - करते
जैसे खत्म हो जाती है
लाखो की लिखी गिनतियाँ
धीरे-धीरे
जैसे सवेरा होने से पहले ही
एक नही सुबह के साथ
सूर्य की एक प्रदीप्त ऊष्मा में
विलीन हो ने लगते हैं नक्षत्र
धीरे धीरे आती है आहट
खोखले पन की
एक जर्जर जीवन की
जैसे एक एक करके खर्च हो गए
मेरे गाँव के सारे कच्चे मकान
और उसमें रहने वाले
सारे बूढ़े लोग
धीरे-धीरे खर्च हो रहा हूँ मैं
बिल्कुल उसी तरह जैसे
खत्म हो रही है हमारी संस्कृति
हमारी सभ्यता , हमारे संस्कार
और उसके साथ
खत्म हो रहे हैं नानी के नुस्खे
दादा की स्वर्णिम स्मृति
और उनकी धुंधली सी तस्वीर
की तरह मैं भी ,धीरे धीरे
ख़र्च हो रहा हूँ
जैसे जैसे खर्च हो रहा है समय
जैसे खर्च हो रहा है मेरा शरीर
मेरे विचार
---------------------------
©सुल्तान मोहित बाजपेयी