उससे अलग होकर भी हम हँस रहे थे
वो किसी और से जुड़ कर भी ख़ुश न थी
उस दिन भीड़ में भी वो अकेली सी लग रही थी
हम अकेले होकर भी हँस रहे थे
सबके सामने हँसते उसके होंठ..आँखे फिर भी उदास थी
मैं सबके सामने ख़ामोश..मेरी आँखे फिर भी हँस रही थी
उसे देख कर भी मैंने ख़ुद को रोके रखा था
मेरा वहाँ से बिन देखे गुज़रना..उसे बैचेन कर रहा था
वो मुझसे जुदा होकर...शायद ख़ुश न थी
मैं उससे जुदा होकर भी उससे जुड़ा हुआ था
हाँ ..वो मेरे होने का दावा करने पर भी मेरे न हो सके थे
मैंने अपना दावा छोड़ने के बाद भी उनका हक़ मुझ पर रहने दिया था .....
-A A राजपूत ‘अक्श ‘