परम्परा
पहले मैं बच्चों का ख्याल रखता था
अब बच्चे मेरा ख्याल रखते हैं,
तब में उनके आँसू पोछता था
अब वे मेरे आँसू पोछते हैं।
जिस खुशी में वे दौड़े थे
अब उस खुशी में,मैं टहलता हूँ,
जिस आकाश के वे किनारे थे
उस आकाश को मैं टटोलता हूँ।
जहाँ उनकी परिच्छाइयां थीं
वहाँ मैं अब बैठता हूँ,
जिस जगह वे खेलते थे
वहाँ मैं टकटकी लगाता हूँ,
जहाँ वे मन को खोलते थे
वहाँ मैं मन को बाँधता हूँ।
****महेश रौतेला