My New Poem ....!!!!
*तुलना के खेल में मत उलझो,*
*क्योंकि इस खेल का
कहीं कोई अंत नही,,,*
*जहाँ तुलना की शुरुआत होती है,*
*वही से आनंद और
अपनापन समाप्त होता है...!!!*
*प्रभुजी ने भी अनगिनत जीव बनाए है,
*पर तुलनायोग्य एक भी नहीं
ना फ़िंगरप्रिंट मिलती ना DNA...!!!*
*सौ खुद अपना व्यक्तित्व निखारो,
कमँ आपके पात्रतायोग्य गर होगें
तो बधाईयाँ खुद कदम चुमेगी..!!!*
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