संकट में है संविधान, यह सत्ता बौनी है।
शिक्षा में है व्यवधान, यह कुर्सी मौनी है।
चमचों और चाटुकारों का राज रहा।
ऐसे ही फर्जी नेताओं का ताज रहा।
शिक्षा के मंदिर बन गये सराय यहां।
काग कोयलों पे करें कांय कांय यहां।
दिन- रात चलें कुर्सी के शडयंत्र यहां।
खतम हो गये आदर्शों के मंत्र यहां।
सत्ता नेताओं की अब बनी बिछौनी है।
हमारा राजतंत्र अब दागतंत्र में बदल गया।
लोभी सियार कुर्सी की खातिर मचल गया।
आज सिंह बगुला भगतों के बीच खड़े।
सर रोज चाटुकारिता के चलते सिंह मरे।
गीदड़ भभकी से डरी हुई यह संसद है।
भ्रष्टाचार की गद्दी में पसरा हर एक पद हैं।
यहां आज,एक रुपये की कीमत पौनी है।
वोटों के भिखमंगे बनते जनप्रतिनिधि हैं।
संचय करते जन जन से अपरंपार निधि हैं।
शासन की निधियों को खपत नहीं करते।
बनते ऐसे की जैसे वर्षों से हैं भूखे मरते।
भलाई के बदले होता वोटों का धंधा है।
सावन में जैसे गधा भी हो जाता अंधा है।
खुद सरकारें लोकतंत्र के लिए डिठौनी है।
अनिल अयान।