सर्द आहें आज भी हैं रुकी हुई मेरी साँसे आज भी हैं,
आँसू तो कब के थम चुके पर तेरी यादों की नमी इन आँखों में आज भी है,
जानता हूँ तू जा चुकी है जिन्दगी से मेरी सदा के लिए मगर!
बची हुई इन यादों का किस्सा मैं कैसे बयान करूँ?
तू ही बता ऐ जिंदगी अपनी मोहब्बत का मैं कैसे एहतराम* करूँ?
बन्द किताबों सा था खोया मैं कहीं कुछ किताबों के बीच में,
कि जाने किधर से उसकी नजर मुझपे पड़ी,
जिंदगी की किताब को जब छुआ था कभी अपने नाजुक हाथों से उसने,
उसके हाथों की खुशबू उन अनछुए पन्नों में सिमटी आज भी है,
धूल से लिपटी उसके हाथों की खुशबू को मैं कैसे साफ करूँ?
तू ही बता ऐ जिंदगी अपनी मोहब्बत का मैं कैसे एहतराम* करूँ?
ना पढ़ती है वो ना सुनती है वो,
बढ़ती हुई प्यास को और बढ़ाती है वो,
तपती हुई रेत में तन्हा छोड़ा इस कदर कि,
बुझता ये दिल उसे पाने की फिराक में सुलगता आज भी है,
ज़र्द अपनी इस दास्तान को मैं कैसे सुबह शाम कहूँ?
तू ही बता ऐ जिंदगी अपनी मोहब्बत का मैं कैसे एहतराम* करूँ?
एक सदी के किस्से को खुद में समेटे हवाओं के साथ बह रहा हूँ,
कि अब कागज के चंद टुकड़े बन कर रह गया हूँ,
ना मिटाता है कोई ना जलाता है कोई,
जख्मी इस दिल पर ना तरस खाता है कोई,
जिस पर लिखी मेरी जुल्में वफा आज भी है,
जुल्में वफा का अपने मैं उससे कैसे कोई सवाल करूँ?
अब तू ही बता ऐ जिंदगी अपनी मोहब्बत का मैं कैसे
एहतराम* करूँ?
( * एहतराम - बयान )