English Quote in Story by Atul Singh

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This is a tribute to that old lady to whom I saw on a bus during my "Chandrashila" trip. I know she is not going to read it and neither that cashier of that bus but with the help of my this step I am going to reduce my pain what I felt on the bus for that lady.

**********बूढ़ी माँ की गिड़गिड़ाहट************

मन जो ये रूकता कभी ना
लोभ की आशा में ये
छल करे कपवट करे ये, क्रोध भी कराता है ये
बस में मैं बैठा रहा, देखता रहा सब वहाँ
एक बूढ़ी माँ जो अपने कंधे पर बोझा लिए
उस बस के खाजाँचीये से गिडगिड़ किए जा रही थी।
थोड़ी देर ठहर जा तू पूत मेरे, सामान कुछ छूटा है मेरा
बस कुछ पल की ही तो बात है, चल लूंगी मै भी साथ तेरे
शायद उसे यह खबर थी की जिस बस में वो जा रही थी
एक अंतिम बस थी वो, उस दिन की और उस पहर की
ना जाने कब आएगी अब, नई सुबह की एक नई बस
बुढ़िया बेचारी शायद, यह सोच कर गिड़गिड़ाये जा रही थी
निसकाशित किया उस बूढ़ी माँ को उसने
उस बस की दहलीज़ से।
बैठा वहाँ मैं, सुनता रहा सब
मन में क्रोध की धारा लिए, ख़ुद को बहलाए जा रहा था
सोचता रहा की क्या करे भी वो
शायद, उस खाजाँचीये का भी यह एक बेदर्द भरा फ़र्ज़ है
पीछे खड़ी गाड़ियों की पीठ में जो दर्द है।
रास्ते में एक यूवती ने एक इछा कही
मैं चाहती हूँ एक पहचान रखना, संगम बनीं दो दरियाँ की
बेदर्द खाजाँचीये को मोह आया और बस खड़ी कर दी वहीं
अब क्रोध की ज्वाला उठी, मन किया कुछ भला-बुरा कह दूँ इसे
पर याद आई यह बात,
क्यूँ करूँ मैं क्रोध जब मीट जाना सभी को एक दिन
गलत किया इसने अभी जो, दंड तो भुगतेगा ही
एक दिन बूढ़ा हो जाएगा, उस बूढ़ी माँ की भाँति ही
प्रकृति का जो नियम है - राहों में तो भटकेगा ही
क्रोध की ज्वाला बुझी अब, मन भी अब शांत है
यूवती को क्या कहूँ मैं
वह तो इन सब ख़बरों से भी नींद में अंज़ान है
वह भी तो मेरे मन में बसी आशा की एक पहचान है|

English Story by Atul Singh : 111173639

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