Hindi Quote in Poem by Jyotsna Yadav

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#kavyotsav2
माँ की दुविधा

‘’माँ’ शब्द में जादू है,
माँ शब्द सुनते ही घिर जाती हूँ अपनेपन, प्यार, दुलार उड़ेलती परछाई से,
भूल अपनी परेशानियों को खो जाती हूँ आकस्मक बचपन के गलियारों में,
राजमा चावल, गाजर का हलवा, दाल चूरमा,
सर्दी की धूप में कभी गन्ना कभी शकरकंदी
माँ के हाथ का जायका और साथ बहुत याद आता है
हर दौर की नई कहानी है पर माँ न कभी होती पुरानी है
नये दौर ने माँ के प्यार को बांटा है,
सपनों और आकांक्षाओ ने उसे मजबूर कर डाला है।
जो पाया अपनी माँ से क्या दे पायी अपने बच्चों को,
यही कष्ट उसे हर पल सताता है ।
कितना अधूरा लगता ये मातृत्व का एहसास है
न मंहगे खिलौने न देश विदेश यात्रा की सौगात
माँ का साथ ही था सबसे बड़ी बात
पर अपनी माँ सा साथ क्या लौटा पाई अपने बच्चों के हाथ
यही दुविधा उसे सताती है
कैसे हो इस दुविधा का अंत बस यही सोचती जाती है
परिवर्तन प्रक्रति का नियम है
यही सोच इस कोशिश में जुट जाती कि
अपनी माँ सा प्यार अपने बच्चों को दे पाये ।

Hindi Poem by Jyotsna Yadav : 111168437
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