असलम भाई आज बड़े खुश नजर आ रहे थे,चाय के दुकान पर उनकी महबूबा ने हाल जो पूछा था,पूछा था मुस्कुराकर,कैसे हो असलम?असलम भाई ने जैसे ईद और दीवाली एक ही दिन मना ली थी।दिन गुज़रते गए महबूबा दिखनी बंद हो गयी ,असलम भाई ने पता किया क्या हुआ,तब सलीम चाचा ने बताया कि महबूबा को देखने लड़के वाले आये थे।असलम भाई परेशान उन्हें लगा ये क्या हो गया,वे चाय की दुकान पर गए,आंखों में नमी, हांथो में काँपती हुई चाय की ग्लास में अकरम मियां को समझते देर ना हुई,वो बोलने लगे "मियां ये प्यार अक्सर साये की तरह अंधेरे में छोड़ जाती हैं"असलम भाई समझने की कोशिश कर रहे थे पर समझ नही पा रहे थे,अब गलती महबूबा की भी नही रही।वो तो सिर्फ हाल चाल ही पूछा था उसने,पर इस ओर तो कोई बेइंतेहा मुहब्बत किये जा रहा था।महीने के 17 तारीख को उसी चाय के दुकान के सामने से बारात गुज़र रही थी,किसी शफ़ीक़ की शादी हो रही थी,पर असलम भाई वही नम आँखों से वो बारात को उसी मुहल्ले की ओर जाते देख रहे थे,जहां कभी वो घंटो बिताया करते थे।आज वो गल्ली भी बेगानी हो गयी थी,वो महबूबा भी बेगानी थी,असलम भाई चाय पीते रहे ,आँखों से आंसू आते रहे।असलम भाई से रोया भी नही गया इस बार।