रात आई, वो ना आई
हर्जाई ने भेज दिया पैगाम
केहती है...
जहन मै रहता कोई और
अब तुझे मेरा क्या काम
साथ लिए चलते थे जो
अब लेते भी नही मेरा नाम
होती ना थी सुबह कोई
ना होती मेरा बिना थी शाम
होना ही था यह एक दिन
देना क्या किसी को इल्जाम
भूल गए तुम यूं मुझ को
जैसे बात कोई हो आम
वैसे भी रिश्ता था अपना
जैसे संग पैमाने के जाम
ना बिस्तर मै, ना करवट मै
नहीं दूंगी तुझे आराम
केहती है मेरी नींद मुझसे
खुली आखों मै बस्ते जो सपने
उन मै मेरे सपनो का क्या मुकाम ...