“मेरी कीमत 10 लाख क्यों थी?”एक रात की तीव्र इच्छा और भावनाओं के बाद, एक उद्योगपति ने एक गरीब छात्रा को एक मिलियन रुपये देकर छोड़ दिया और बिना कोई निशान छोड़े गायब हो गया। सात साल बाद उसे पता चला कि आखिर उसकी “कीमत” इतनी क्यों थी।
उस रात, शराब की गर्मी और नई दिल्ली के पॉश इलाके चाणक्यपुरी की चमकती रोशनी के बाद, वह एक होटल के कमरे में जागी जिसकी खिड़की से भव्य राजपथ मार्ग का दृश्य दिखाई दे रहा था। सुबह की पहली किरणें इमारतों को हल्का सुनहरा रंग दे रही थीं, और उसी क्षण उसे हकीकत का भार महसूस हुआ।
उसका नाम काव्या शर्मा था, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र संकाय में तीसरे वर्ष की छात्रा थी। वह राजस्थान के एक छोटे से गाँव से आई थी। उसके माता-पिता किसान थे; उनके हाथों पर मिट्टी और मेहनत के निशान थे। वे जो भी रुपये उसे भेजते थे, वह एक मौन बलिदान था—अपनी बेटी के भविष्य पर लगाया गया विश्वास।
बिस्तर के पास की मेज पर एक मोटा लिफाफा रखा था। उसे खोलते समय उसके हाथ कांप रहे थे। अंदर एक मिलियन रुपये थे। और एक छोटा सा नोट:
“इसे किस्मत समझ लो। मुझे ढूँढने की कोशिश मत करना।”
वह आदमी गायब हो चुका था।
कुछ दिनों तक काव्या शर्म और जरूरत के बीच झूलती रही। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी गरिमा की कीमत तय कर दी हो। लेकिन किराया बकाया था। विश्वविद्यालय की फीस दो हफ्तों में जमा करनी थी। उसके छोटे भाई को स्कूल के लिए किताबों की जरूरत थी। हकीकत किसी का इंतजार नहीं करती।
बहुत आँसू बहाने के बाद उसने एक फैसला किया: वह उस पैसे को अपनी पहचान तय नहीं करने देगी। वह इसे एक पुल बनाएगी, बेड़ी नहीं।
उसने विश्वविद्यालय के अपने सारे कर्ज चुका दिए। अपने माता-पिता को बड़ी रकम भेजी ताकि वे घर की छत ठीक कर सकें और खेती बेहतर कर सकें। बाकी पैसे उसने एक निवेश खाते में रख दिए। धीरे-धीरे वह भावना कि यह एक अपमान था, मिटने लगी—और उसकी जगह एक अवसर ने ले ली।
साल बीत गए।
काव्या ने सम्मान के साथ स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उसकी प्रतिभा और अनुशासन ने एक प्रतिष्ठित वित्तीय कंपनी के दरवाजे खोल दिए। उसने नीचे से शुरुआत की—बैलेंस शीट का विश्लेषण करना और अंतहीन रिपोर्ट लिखना—लेकिन जल्द ही उसके वरिष्ठों ने उसकी रणनीतिक सोच को पहचान लिया। वह पद दर पद ऊपर बढ़ती गई। उसने एक छोटा सा अपार्टमेंट खरीदा। उसने अपने माता-पिता को पहली बार राजधानी देखने के लिए बुलाया। उसका भाई भी विश्वविद्यालय में दाखिल हो गया।
बाहर से उसका जीवन सफलता की कहानी लग रहा था। लेकिन भीतर अब भी एक सवाल अनुत्तरित था।
वह आदमी कौन था? उसने ऐसा क्यों किया?
सात साल बाद, किस्मत ने उन्हें फिर से आमने-सामने ला खड़ा किया।
अक्टूबर की एक दोपहर, उसकी कंपनी ने उसे एक वित्तीय सम्मेलन में भेजा—एक शानदार होटल में, ठीक उसी राजपथ क्षेत्र के पास। जैसे ही वह लॉबी में दाखिल हुई, उसकी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। यादें कभी खत्म नहीं होतीं; वे बस सो जाती हैं।
जब वह अपना पहचान पत्र देख रही थी, पीछे से एक गहरी आवाज आई:
—काव्या शर्मा?
वह धीरे-धीरे मुड़ी। जैसे समय थम गया हो। सामने खड़े आदमी के बालों में अब हल्की सफेदी थी, लेकिन उसकी शांत आँखें वही थीं।
वही आदमी था।
काव्या ने गहरी सांस ली। अब वह उस सुबह की डरी हुई लड़की नहीं थी। अब वह एक आत्मविश्वासी महिला थी।
—मुझे जवाब चाहिए —उसने सीधे कहा।
वे दोनों हॉल के एक शांत कोने में बैठ गए। कार्यक्रम का शोर दूर-सा लग रहा था।
आदमी ने कहना शुरू किया:
—उस रात… तुम बहुत थकी हुई थीं और तुमने अपने शरीर की क्षमता से ज्यादा पी ली थी। तुमने मुझे अपने माता-पिता के बारे में बताया, अपने भाई के बारे में, और इस डर के बारे में कि कहीं तुम्हें विश्वविद्यालय छोड़ना न पड़ जाए। तुमने मुझे कई दशक पहले का अपना ही अतीत याद दिला दिया।
काव्या ने भौंहें सिकोड़ लीं