सिर्फ़ तू… (एक पत्नी का प्रेम)
इश्क़ भी तू,
हक़ भी तू,
मेरी हर सांस का
सच भी तू…
दुनिया चाहे
सवाल उठा ले मुझ पर,
मगर मेरे माथे की
बिंदी की कसम,
मेरी पहचान
सिर्फ़ तू…
तेरे इंतज़ार में
वक़्त थक जाए,
पर मेरी वफ़ा
कभी न थके…
मैं पत्नी हूँ,
कोई कमज़ोरी नहीं,
तेरे नाम की
सबसे बड़ी ताक़त हूँ…
तेरे लिए चुप रहना भी
इबादत है मेरी,
और अगर ज़रूरत पड़े,
तो तेरे लिए
पूरी दुनिया से
लड़ जाना भी आता है मुझे…
तेरे सिवा किसी को
हक़ नहीं
मेरे ख़्वाबों तक आने का,
क्योंकि मेरा हर ख़्वाब
तेरे नाम लिखा है…
आग लगती है
जब लोग कहते हैं —
“पत्नी सिर्फ़ निभाती है”
अरे साहब,
पत्नी अगर चाहे
तो पूरी ज़िंदगी
जला कर
रौशन कर दे… 🔥