ख़ामोशी का जुर्म
मैं लिख दूँ, तुम सह न पाओगे,
फिर कोई झूठा इल्ज़ाम लाओगे ।
मेरी ख़ामोशी को मेरी ख़ता कहकर,
क्या तुम अपने जुर्म से बच जाओगे?
सच जब आईना बनकर बोलेगा,
तुम नज़रें झुकाकर मुकर जाओगे ।
वक़्त गवाह बनेगा एक दिन,
उस वक़्त भी तुम कहाँ आओगे?
“रवि” ने हर मर्म काग़ज़ पर छोड़ा,
तुम फिर हर लफ़्ज़ को ज़हर बताओगे ।