हर काश यदि तय हकीकत होती,
तो इंसान इंसान न रहकर भगवान हो चुका होता…
इंसान की इंसानियत सदैव इंसान बने रहने में है;
भगवान बनने की हर कोशिश
उसे भीतर से विचलित
और बाहर से बोझिल कर देती है।
और शायद मैं इन इंसानों की दुनिया में रहने वाली एक विचलित आत्मा हूँ,
जिसका आत्म–शरीर कहाँ जा छूटा,
मुझे स्वयं भी ज्ञात नहीं —
और इन भगवानों की श्रेणी में
कदाचित मेरा कोई स्थान नहीं।
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- softrebel