उसने बड़े आसानी से कह दिया –
कल मरो तो आज मर जाओ,
और अच्छा है… जल्दी मर जाओ।
आज मेरी आख़िरी उम्मीद भी टूट गई,
अब मन नहीं करता कुछ लिखने का…
क्योंकि अब भीतर कुछ बचा ही नहीं।
जिसे अपना सब कुछ माना था,
उसी के आख़िरी शब्द ज़हर बन गए।
अब क्या रखूँ उम्मीद…
जब सांसों की कीमत
उसी की नज़रों में शून्य हो गई।