कभी फुर्सत मिले तो पढ़ना मेरी आँखों की नमी को,
कि कैसे छिपा रखा है मैंने तुम्हारी कमी को।
मोहब्बत तो मुकम्मल होती है बस रूह के मिलन से,
वरना जिस्म तो तरसते रहते हैं अपनी ही ज़मीं को।
तुम्हें चाहना अब इबादत जैसा लगने लगा है मुझे,
जैसे सूखी हुई मिट्टी माँगती है बारिश की नमी को
- kajal jha