रस्ते में लुट गया है तो क्या काफिला तो है
यारों नए सफर का अभी हौसला तो है
वामांदगी से उठ नहीं सकता तो क्या हुआ
मंजिल से आश्ना न सही नक्श-ए-पा-तो है
हाथों में हाथ ले के यहां से गुजर चलें
कदमों में पुल-सिरात सही रास्ता तो है
मौंगे की रौशनी तो कोई रौशनी नहीं
इस दौर-ऍ-मुस्तआर में अपना दिया तो क्या
ये क्या जरुर है मैं कहूं और तू सुने
जो मेरा हाल है वो तुझे भी पता तो है
अपनी शिकायतें न सही तेरा गम सही
इझहार-ए-दास्तां का कोई सिलसिला तो है
हमने कोई तअल्लुक-ए-खातिर तो है उसे
वो यार बा-वफा न सही बेवफा तो है
वो आए या न आए मुलाकात हो न हो
रंग-ए-सहर के पास खिराम-ए-सबा तो हो
पाव की चाप से मिरी धडकन है हम-नवा
इस दश्त-ए-हौल में कोई नग्मा-सरा-तो है
सूरज हमारे घर नहीं आया तो क्या हुआ
दो चार आंगनों मे उजाला हुआ तो है
कांटा निकल भी जाएगा जब वक्त आएगा
कांटे के दिल में भी कोई कांटा चुभा तो है
मैं रेजा रेजा उडता फिरुंगा हवा के साथ
सदियों में झांक कर भी मुझे देखना तो है
आशीब-ए-आगही की शब-ए-बे-कनार में
तेरे लिए 'जमील ' कोई सोचता तो है
जमील मलिक