ये हुं नामक श्ब्द मे ही स्वार्थ छुपा है, इस हुँ की जगह हम बोलके एक बार देखीये तो सही , कीइ पराया नही होगा कीसीसे बेर नही लगेगा, कीसीका मान सन्मान अपमान और मेरा तेरा ही नही रहेगा, और कोइ उच नीच का भेद नही रहेगा।। हुँ मे कीतना अभीमान, स्वार्थ, अकेला पन है, तो फीर कयुं इस हुँ से इतना लगाव रखे , इस हुँ को क्योना त्याग कर हम बन जाये, और महोबते बाटे।। आप कीतना ही मुजे गलत समजे मे तो यही ही कहुंगा आप मानो तो भी ना मानो तो भी।।
जीयो और जीने दो।।
Raajhemant