शीर्षक: वतन का रखवाला
"वतन की गोद में हम सब ने पायी एक जन्नत है,
शहादत और इबादत की ये पावन सी विरासत है।
लहू देकर जो सींचें गुलसिताँ को वो ही 'आशीष' हैं,
तिरंगे की बुलंदी ही हमारी सबसे बड़ी चाहत है।"
"जहाँ की गोद में हमने सुनहरी शाम देखी है,
जहाँ की मिट्टी में अपनी सुबह की शान देखी है।
वो जिसके ज़र्रे-ज़र्रे में वफ़ा का नूर बहता है,
उसी आग़ोश में हमने अपनी पहचान देखी है।
हिमालय सर उठा कर जिसके पहरे को खड़ा रहता,
समंदर पाँव धोने को जिसे बेताब है रहता।
जहाँ की सरज़मीं हर हाल में सरसब्ज़ रहती है,
वहाँ का बच्चा-बच्चा बस यही पैगाम है कहता।
लहू का आख़िरी कतरा वतन के नाम कर देंगे,
सजा कर सर पे खुशियों का नया ईनाम कर देंगे।
खड़ा हूँ सरहदों पर मैं दुआ का एक 'आशीष' बनकर,
तिरंगे की हिफाज़त में हम अपनी जान कर देंगे।"
क्या आप इस नज़्म में शहीदों की गाथा जोड़ना चाहेंगे या इसे नौजवानों के जोश पर ही केंद्रित रखना चाहेंगे?
"शहीदों की इबादत से ये हिंदुस्तान ज़िंदा है,
हवाओं में वफ़ा का आज भी अरमान ज़िंदा है।
गए जो खेल कर जानों पे वो लौटे नहीं लेकिन,
उन्हीं के दम से अपनी कौम का सम्मान ज़िंदा है।
वो जब निकले थे घर से, सर पे बांधा था कफ़न अपना,
वतन की आबरू पर वार दिया खिलता चमन अपना।
किसी की मांग का सिंदूर, किसी की गोद सूनी थी,
मगर आँच आने न दी, माँ का बचा रखा बदन अपना।
लिखा इतिहास को जिसने अपने सुर्ख लहू से ही,
बचाया मुल्क को जिसने हर एक दुश्मन और डूह से ही।
खड़ा है आज भी सरहद पे जो इक 'आशीष' बनकर,
निकाली जां है जिसने आज़ादी की रूह से ही।
सलामत है अगर ये मुल्क तो उन जांबाज़ वीरों से,
जिन्होंने जंग जीती मौत की तीखी लकीरों से।
झुकेंगे हम न तब तक, जब तलक है जोश बाक़ी,
आज़ाद हैं हम और रहेंगे आज़ाद जंजीरों से।"
उबलता खून रग में हो, तो फिर तूफ़ान आता है,
वतन के वास्ते मरना, बड़ा अहसान आता है।
न पूछो हाल वीरों का, कि जब वो जंग लड़ते हैं,
तो काँपे थर-थर दुश्मन, मौत का सामान आता है।
हिमालय की बुलंदी सा, इरादा ठोस रखते हैं,
उजाले के लिए हम, जुगनुओं का रोष रखते हैं।
सियाचीन की बर्फ़ों में, जहाँ सांसें भी जम जाएं,
वहाँ भी हम वतन की भक्ति का मदहोश रखते हैं।
ललकारें जब गूँजती हैं, गगन भी काँप जाता है,
शहीदों के लहू से ही, चमन ये मुस्कुराता है।
खड़ा है सरहदों पर जो बन कर एक 'आशीष',
उसी की जाँ-निसारी से तिरंगा जगमगाता है।
चढ़ा दो शीश चरणों में, ये मिट्टी मान माँगती है,
पिला दो खून दुश्मन को, ये धरती दान माँगती है।
उठा लो हाथ में परचम, दिखा दो अपनी ताक़त को,
हुकूमत हिन्द की अब, विश्व में पहचान माँगती है।
Adv. आशीष जैन
7055301422