माँ की ओर से बच्चे के लिए
तू जब मेरे हाथों में आया, नन्हा सा एक सपना बनकर,
मैं खुद को ही भूल गई, बस तुझमें ही सिमटकर।
अपना दर्द, अपनी खुशियाँ, सब तुझ पर वार दीं,
तेरी एक मुस्कान के लिए, मैंने हर खुशी हार दी।
जब तू थोड़ा सा बड़ा हुआ, तेरी हँसी ने मुझे हँसना सिखाया,
तू मेरे सिवा किसी की गोद में न गया, ये देख मन भर आया।
सब कहते थे, मैं तुझसे ज़्यादा प्यार करती हूँ, तुझे रोने नहीं देती,
पर क्या करूँ, माँ हूँ मैं, तेरी आँखों में आँसू देख नहीं सह पाती।
सबकी माँ अपने बच्चों को गलती पर डाँटती है,
पर मुझे तुझ पर भरोसा था, कि तू कभी राह नहीं भटकता है।
ज़रा सा दर्द हो जाए तुझे, तो दिन-रात तेरे पास बैठी रहती,
माँ हूँ न, अपने हिस्से का दर्द मैं कैसे देख पाती।
पर आज जब तू मेरे कंधों से ऊँचा हो गया,
तो मन में एक अनजाना सा डर भी आ गया।
तेरी ज़िंदगी में दोस्ती और दुनिया समा गई,
डर बस यही रहा, कहीं तू गलत राह न चुन जाए।
डर ये भी है कि कहीं तू खुद को न खो दे,
भीड़ में अपनी पहचान कहीं भूल न दे।
जब तेरी आवाज़ तेज़ हुई, तो मन घबरा गया,
सोचा—अब तुझे समझाऊँ कैसे, ये समय बदल गया।
पर हर माँ का डर उसकी ममता से जुड़ा होता है,
बेटा, मेरा हर डर बस तेरी खुशियों के लिए होता है