मत कहो हमें रटने वाले,
हम नया पैगाम रचते हैं।
काँटों से गुज़रकर हम तो,
फूलों की महक बिखेरते हैं।
धूप-छाँव को महसूस कर,
शब्दों को रंगों में उतारते हैं,
हम फसल की तरह उगते हैं।
कोई न समझे तो टूट जाते हैं,
काँटों और फूलों में हमें फर्क नहीं दिखता,
हम काँटों को भी फूल समझते हैं।"
- Std Maurya