जूते
साथ सब ने छोड़ दिया,
वक़्त ने भी मुँह मोड़ लिया,
भीड़ में रहकर भी
मैंने खुद को अकेला छोड़ लिया।
जो अपने थे,
ज़रूरत बनते ही पराए हो गए,
कंधे जिन पर भरोसा था,
वो अचानक बोझ से घबरा गए।
लेकिन—
फटे, टूटे जूते आज भी
मेरे साथ हैं,
हर पत्थरीली राह पर
मेरी तक़दीर के गवाह हैं।
जब पाँव छिले,
तो इन्होंने शिकायत नहीं की,
जब लोग हँसे,
तो इन्होंने शर्म महसूस नहीं की।
हर गिरावट में
मुझे उठना सिखाया इन्होंने,
हर मंज़िल से पहले
संघर्ष का मतलब बताया इन्होंने।
लोग साथ छोड़ गए
मेरी हैसियत देखकर,
जूते साथ निभा गए
मेरी हालत देखकर।
शायद इसलिए आज भी
सर उठाकर चलता हूँ मैं,
क्योंकि वफ़ा का मतलब
फटे, टूटे जूतों से सीखा है मैंने।
आर्यमौलिक