मेरी मां
जैसे तुम्हारी भाषा तुम्हारी माँ है,
वैसे ही हिंदी भाषा मेरी माँ है।
जिसकी गोद में मैंने पहला शब्द बोला,
जिसके आँचल ने हर भाव को खोला।
उसके अक्षर मेरी साँसों में बसे हैं,
मेरे सपनों, विश्वासों में बसे हैं।
जब मन टूटा, तो उसी ने सहलाया,
जब मैं चुप रहा, उसी ने बुलवाया।
उसकी लोरी में संस्कारों की गंध है,
उसकी वाणी में मिट्टी की सुगंध है।
मेरा गर्व, मेरी पहचान वही है,
मेरी हर मुस्कान की जान वही है।
तुम अपनी भाषा से रखो प्रेम अपार,
मुझे हिंदी से है माँ जैसा ही प्यार।
क्योंकि जैसे माँ से बढ़कर कुछ नहीं,
वैसे हिंदी से बढ़कर मेरी दुनिया नहीं।
आर्यमौलिक