वो गलियां अब सुनी हैं
जहां कभी सब चला करते थे,
हंसी की गूंज थी हर मोड़ पर,
आज सन्नाटे वहां पला करते हैं।
दीवारों ने पहचान दी थी हमें,
कदमों की आहट से दरवाज़े खुलते थे,
अब वही दरवाज़े खामोश खड़े,
जैसे सवाल पूछते—तुम लौटोगे कब?
शामें पहले नाम पुकारती थीं,
चाय की भाप में सपने घुलते थे,
आज धूल में दबी हैं वो शामें,
और सपने किसी और शहर में सुलगते हैं।
वो गलियां अब सुनी हैं,
पर यादें अब भी जागती हैं,
कभी-कभी हवा बतियाती है—
“सब यहीं था, बस वक़्त बदल गया।”
आर्यमौलिक