बीत रही उम्र… सवाल अभी खड़े हैं
बीत रही उम्र, सवाल अभी खड़े हैं,
वक़्त की दहलीज़ पर कुछ पल जड़े हैं।
जो सोचा था कभी, वो पूरा न हो सका,
उसी अधूरेपन में सपने पड़े हैं।
पुरानी यादों के आँसू अब भी पड़े हैं,
दिल के किसी कोने में चुपचाप अड़े हैं।
हँसी की परतों में छुपा दर्द कहता है,
हम आज भी कल की टीस में गड़े हैं।
जिन राहों पर चलना कभी सीखा था,
आज वही राहें अजनबी लगती हैं।
अपने ही फैसलों की छाया में खड़े,
क्यों ये खामोशियाँ इतनी गहरी लगती हैं?
हर शाम हिसाब माँग लेती है जीवन से,
हर सुबह कोई जवाब अधूरा छोड़ जाती है।
चलती साँसों के बीच थमी हुई सी आत्मा,
बस उम्र बढ़ती है, कहानी नहीं बदल पाती है।
फिर भी उम्मीद की एक नन्ही सी लौ,
इन सवालों के अंधेरे में जलती है।
शायद किसी मोड़ पर मिल जाए सुकून,
इसी भरोसे पर ज़िंदगी आज भी चलती है।
आर्यमौलिक