जहाँ शब्दों की अहमियत नहीं…
जहाँ शब्दों की अहमियत नहीं,
वहाँ क्या लिखें अपने एहसासों को?
जहाँ ख़ामोशी ही जवाब बन जाए,
वहाँ कौन समझे इन जज़्बातों को?
जब बोलने से अर्थ खो जाए,
और कहने से सच अधूरा लगे,
तब आँखों की नमी ही काफ़ी है,
हर बात लफ़्ज़ों से ज़्यादा लगे।
कुछ रिश्ते शब्द नहीं माँगते,
बस मौजूदगी की धूप चाहिए,
एक चुप सा साथ, एक ठहरा पल,
जहाँ वक़्त को भी साँस चाहिए।
वहाँ एहसास हवा बन जाते हैं,
जो छूकर भी दिखाई नहीं देते,
दिल समझ लेता है दिल की भाषा,
जहाँ होंठ कुछ भी कह नहीं देते।
तो वहाँ लिखना भी क्या लिखना है,
जहाँ महसूस करना ही काफी हो,
जहाँ शब्द हार मान लेते हैं,
और ख़ामोशी ही सबसे बड़ी गवाही हो।
आर्यमौलिक