एक ख़ूबसूरत शाम का एहसास
शाम…
दिन और रात के दरमियान ठहरने वाला वो नाज़ुक सा वक़्त,
जब सूरज अलविदा कहता है और चाँद आने की आहट देता है।
इस वक़्त फिज़ा में एक अजीब सी ख़ामोशी होती है,
जो दिल के हर कोने को सुकून से भर देती है।
ढलती हुई शाम में आसमान गुलाबी और सुनहरी लिबास ओढ़ लेता है।
हवा में घुली होती है यादों की खुशबू,
और दिल बेइख़्तियार किसी अपने को याद कर बैठता है।
ये शाम जैसे कहती है—
थोड़ा ठहरो, थोड़ा महसूस करो,
ज़िंदगी सिर्फ़ दौड़ का नाम नहीं।
चाय की चुस्की, बालकनी की रेलिंग,
और सामने फैला हुआ आसमान…
इस पल में फ़िक्रें भी हल्की लगने लगती हैं।
शाम हमें सिखाती है कि
हर ढलते सूरज के बाद भी
नई रौशनी का यक़ीन ज़िंदा रहता है।
यही तो है एक ख़ूबसूरत शाम—
जो थके हुए दिल को उम्मीद,
और उलझी हुई रूह को सुकून दे जाती है।