The Download Link has been successfully sent to your Mobile Number. Please Download the App.
Continue log in with
By clicking Log In, you agree to Matrubharti "Terms of Use" and "Privacy Policy"
Verification
Download App
Get a link to download app
उबलता हुआ पानी भी सोचता होगा …. यदि बीच में बरतन ना होता तो आग का क्या होता ? उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
प्रचण्ड प्रभाकर ज्वाला बरसाए, धरा दग्ध हो व्यथा सुनाए। तप्त पवन के तीक्ष्ण प्रहारों से, व्याकुल हो उठता संसारा। दिग्दिगंत दहके दावानल-सा, छाया भी शरण न दे पाती, स्वेद-बिंदुओं की सरिता बहती, निद्रा पलकों से डर जाती। तभी किसी प्रतिभा-पुरुष ने, शीतल यंत्र-विज्ञान रचाया, अहंकारी आदित्य के सम्मुख, हिम-स्पर्शी साम्राज्य बसाया। अब सूर्य सहस्र किरणें फेंके, गृह के भीतर शिशिर समाया, जिसने वातानुकूलन गढ़ डाला, उसने सचमुच सूर्य हराया। उषा जरवाल ‘ एक उन्मुक्त पंछी’
“साधारण सी स्त्री” तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा… मैं एक साधारण सी स्त्री हूँ, हठी बहुत हूँ मैं। ना मैं सती, ना उर्वशी, मैं एक साधारण सी स्त्री, बावली बहुत हूँ मैं। तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा। मैं अट्ट स्वाभिमानी, बहुत बोलने वाली, अगर रूठ जाऊँ तो घंटों चुप रहने वाली। छोटी-छोटी बातों पर खिन्न हो जाने वाली, बेवजह हँसने वाली, बेहिसाब रोने वाली, बहुत ज़्यादा सोचने वाली… तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा… मैं एक साधारण सी स्त्री हूँ, हठी बहुत हूँ मैं। अगर चरित्र पर बात आ जाए तो आक्रामक बहुत हूँ मैं, खुद के लिए मशाल और खुद में क्रांति बहुत हूँ मैं। तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा… मैं एक साधारण सी स्त्री हूँ, हठी बहुत हूँ मैं। स्वाभिमान मेरी प्रथम धरोहर, उसकी रक्षा ही मेरा श्रृंगार है। मैं झुकूँ प्रेम में सौ बार मगर, अपमान पर मौन रहना अस्वीकार है। मैं कोमल हूँ, पर दुर्बल बिल्कुल नहीं, अपने सम्मान की प्रहरी हर बार हूँ मैं। हाँ, एक साधारण सी स्त्री हूँ मैं, पर स्वाभिमान से ही साकार हूँ मैं।
मनुष्य को अपने स्वाभाविक स्वरूप को ही सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। परानुकरण के मोह में पड़कर व्यक्तित्व का विकृतिकरण उचित नहीं। आवश्यक यह है कि मनुष्य अपने गुणों एवं सामर्थ्य का सतत परिष्कार करे। स्वत्व की मौलिकता ही जीवन का वास्तविक सौंदर्य एवं गौरव है। जो मनुष्य अपने वास्तविक अस्तित्व के अनुरूप जीवन व्यतीत करता है, वही अंतःकरण से सुख एवं शांति का अनुभव कर पाता है। परंतु जो निरंतर दूसरों के अनुकरण में लीन रहता है, वह धीरे-धीरे अपनी मौलिक पहचान भी खो बैठता है। परानुकरण क्षणिक आकर्षण तो प्रदान कर सकता है, किंतु आत्मसंतोष कभी नहीं देता। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह अपने स्वभाव, संस्कार एवं विशिष्टताओं को ही अपने जीवन का आधार बनाए। उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
माँ के आँचल में जैसे पूरा संसार समाया है, हर पीड़ा का उत्तर उसने मुस्काकर पाया है। खुद धूप में जल जाती है बच्चों की छाँव बचाने को, अपने आँसू पी लेती है उनके होंठ हँसाने को। संकट चाहे जितना गहरा, माँ ढाल बन जाती है, अपने बच्चों पर आए आँच तो दुनिया से लड़ जाती है। उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
‘अतिथि देवो भव:’ का सम्मान हम भी खूब निभाते हैं, बस देवताओं से एक छोटी-सी प्रार्थना जताते हैं। अचानक अवतार लेकर घर पर मत आया कीजिए, पहले एक संदेश देकर कृपा बरसाया कीजिए। क्योंकि आपके “सरप्राइज़” के चक्कर में हाल ये हो जाता है— चूल्हा, चौका, काम, आराम… सब भगवान भरोसे सो जाता है। चेहरे पर मुस्कान सजानी पड़ती है, और भीतर की टू-डू लिस्ट रोती रह जाती है। अतिथि बनकर आइए, दिल से स्वागत पाएँगे, बस थोड़ी सूचना दे दीजिए… तो हम भी इंसान से सीधे “गृहलक्ष्मी” बन जाएँगे! 😄
जब खरपतवार का सिंचन कर रहे हैं तो फूलों के मुरझाने पर आश्चर्य क्यों ? उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
मेरा घर कहाँ है? मायके की देहरी ने धीमे से कहा— “बिटिया, अब तू पराई हो गई।” ससुराल की चौखट ने भौंहें चढ़ाकर पूछा— “तू इतना इठलाती ये तेरा घर है क्या?” दो आँगनों के बीच झूलती रही मैं, जैसे प्रश्न कोई, जिसका उत्तर किसी के पास नहीं। एक ने जन्म दिया, पर अधिकार सीमित कर दिया, दूसरे ने अधिकार माँगा, पर अपनापन तौलता रहा। पर अब मैं पूछती नहीं—घोषणा करती हूँ, मैं स्वयं अपनी देहरी, स्वयं अपना आकाश हूँ। नारी हूँ—कमज़ोर नहीं, संकल्प की ज्योति हूँ, अब मैं खामोश नहीं—तीव्र स्वर बन चुकी हूँ, अब किसी देहरी की मोहताज नहीं रही। मैं नारी हूँ—अपना घर खुद रच लेने वाली, जहाँ कदम टिक जाएँ मेरे—वही संसार बना देती हूँ। अब मुझसे मत पूछो—“तेरा घर कहाँ है?” मैं जहाँ खड़ी हो जाऊँ—वहीं घर खड़ा कर देती हूँ। किंतु अब मौन मेरा विवशता नहीं—संकल्प बन चुका है, अश्रु नहीं, अब नेत्रों में तेज का प्रकाश है। मैं आज की नारी हूँ—अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति, प्रचंड तूफानों में भी अपनी नौका पार लगा सकती हूँ। जिसे तुम पराया कहते रहे युगों से— वही आज स्वयं अपना संसार रच सकती हूँ। उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
ऐ ज़िंदगी ! चाहे कितने भी हों तेरे चोचले, परवाह नहीं, क्योंकि बुलंद हैं मेरे हौसले । 😎 उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
टूट गए तो क्या हुआ ? एक दिन फिर से जुड़ जाएँगे । पंख नहीं हैं तो न सही , हम पैरों से उड़ जाएँगे । पैरों ने भी न दिया साथ तो बेचारा न समझना , हम हौंसले वाले हैं जनाब ! लड़ना पड़ा तो हम फ़ौलाद से भी टकरा जाएँगे । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved | Powered by Nichetech.
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
Please enable javascript on your browser