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मनुष्य को अपने स्वाभाविक स्वरूप को ही सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। परानुकरण के मोह में पड़कर व्यक्तित्व का विकृतिकरण उचित नहीं। आवश्यक यह है कि मनुष्य अपने गुणों एवं सामर्थ्य का सतत परिष्कार करे। स्वत्व की मौलिकता ही जीवन का वास्तविक सौंदर्य एवं गौरव है। जो मनुष्य अपने वास्तविक अस्तित्व के अनुरूप जीवन व्यतीत करता है, वही अंतःकरण से सुख एवं शांति का अनुभव कर पाता है। परंतु जो निरंतर दूसरों के अनुकरण में लीन रहता है, वह धीरे-धीरे अपनी मौलिक पहचान भी खो बैठता है। परानुकरण क्षणिक आकर्षण तो प्रदान कर सकता है, किंतु आत्मसंतोष कभी नहीं देता। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह अपने स्वभाव, संस्कार एवं विशिष्टताओं को ही अपने जीवन का आधार बनाए। उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
माँ के आँचल में जैसे पूरा संसार समाया है, हर पीड़ा का उत्तर उसने मुस्काकर पाया है। खुद धूप में जल जाती है बच्चों की छाँव बचाने को, अपने आँसू पी लेती है उनके होंठ हँसाने को। संकट चाहे जितना गहरा, माँ ढाल बन जाती है, अपने बच्चों पर आए आँच तो दुनिया से लड़ जाती है। उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
‘अतिथि देवो भव:’ का सम्मान हम भी खूब निभाते हैं, बस देवताओं से एक छोटी-सी प्रार्थना जताते हैं। अचानक अवतार लेकर घर पर मत आया कीजिए, पहले एक संदेश देकर कृपा बरसाया कीजिए। क्योंकि आपके “सरप्राइज़” के चक्कर में हाल ये हो जाता है— चूल्हा, चौका, काम, आराम… सब भगवान भरोसे सो जाता है। चेहरे पर मुस्कान सजानी पड़ती है, और भीतर की टू-डू लिस्ट रोती रह जाती है। अतिथि बनकर आइए, दिल से स्वागत पाएँगे, बस थोड़ी सूचना दे दीजिए… तो हम भी इंसान से सीधे “गृहलक्ष्मी” बन जाएँगे! 😄
जब खरपतवार का सिंचन कर रहे हैं तो फूलों के मुरझाने पर आश्चर्य क्यों ? उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
मेरा घर कहाँ है? मायके की देहरी ने धीमे से कहा— “बिटिया, अब तू पराई हो गई।” ससुराल की चौखट ने भौंहें चढ़ाकर पूछा— “तू इतना इठलाती ये तेरा घर है क्या?” दो आँगनों के बीच झूलती रही मैं, जैसे प्रश्न कोई, जिसका उत्तर किसी के पास नहीं। एक ने जन्म दिया, पर अधिकार सीमित कर दिया, दूसरे ने अधिकार माँगा, पर अपनापन तौलता रहा। पर अब मैं पूछती नहीं—घोषणा करती हूँ, मैं स्वयं अपनी देहरी, स्वयं अपना आकाश हूँ। नारी हूँ—कमज़ोर नहीं, संकल्प की ज्योति हूँ, अब मैं खामोश नहीं—तीव्र स्वर बन चुकी हूँ, अब किसी देहरी की मोहताज नहीं रही। मैं नारी हूँ—अपना घर खुद रच लेने वाली, जहाँ कदम टिक जाएँ मेरे—वही संसार बना देती हूँ। अब मुझसे मत पूछो—“तेरा घर कहाँ है?” मैं जहाँ खड़ी हो जाऊँ—वहीं घर खड़ा कर देती हूँ। किंतु अब मौन मेरा विवशता नहीं—संकल्प बन चुका है, अश्रु नहीं, अब नेत्रों में तेज का प्रकाश है। मैं आज की नारी हूँ—अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति, प्रचंड तूफानों में भी अपनी नौका पार लगा सकती हूँ। जिसे तुम पराया कहते रहे युगों से— वही आज स्वयं अपना संसार रच सकती हूँ। उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
ऐ ज़िंदगी ! चाहे कितने भी हों तेरे चोचले, परवाह नहीं, क्योंकि बुलंद हैं मेरे हौसले । 😎 उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
टूट गए तो क्या हुआ ? एक दिन फिर से जुड़ जाएँगे । पंख नहीं हैं तो न सही , हम पैरों से उड़ जाएँगे । पैरों ने भी न दिया साथ तो बेचारा न समझना , हम हौंसले वाले हैं जनाब ! लड़ना पड़ा तो हम फ़ौलाद से भी टकरा जाएँगे । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
व्याकरण की रचना करने वालों को हर उस चीज़ में जिसमें नाज़ुकता दिखी उसमें उन्हें स्त्रीत्व दिखा । गुलाब के फूल में नाज़ुक पंखुड़ियाँ दिखी तो स्त्रीलिंग और काँटे दिखे तो पुल्लिंग हो गया । जब पानी मीठा रहा तो नदी स्त्रीलिंग और खारा हुआ तो सागर पुल्लिंग बन गया । जब पानी आसमान में बहुत दूर रहा तो बादल पुल्लिंग और धरती पर बरस पड़ा तो बारिश स्त्रीलिंग हो गई । हवा चलती है और तूफ़ान आता है । युद्ध होता है और शांति होती है । क्रोध उत्पन्न होता है और क्षमा दी जाती है । अंत में उन्हीं व्याकरण रचने वालों ने नारी को ‘अबला’ की संज्ञा भी दे दी । जो स्वयं शक्ति स्वरूप है, साक्षात महादेव भी जिनके क्रोध से बच नहीं पाए वो नारी भला अबला कैसे हो सकती है । मेरे विचार से जो अच्छे से अच्छे सूरमाओं का तबला बजा सकती है वो अबला तो कदापि नहीं हो सकती ।
उपवन होने का गुमान हो गया है तुम्हें लेकिन सच तो ये है कि एक फूल भी नहीं हो तुम । कल्पवृक्ष होने का वहम पाले बैठे हो तो ठीक से पहचान लो कि बबूल भी नहीं हो तुम । स्वयं को शिखर कलश मानते हो पर धर्म की धरोहर का मूल भी नहीं हो तुम । मुझमें दोष निकालने वालो ख़ुद को भी परख लो तुम क्योंकि मुझे आँक सको इतने भी मुकम्मल नहीं हो तुम। 😎 - उषा जरवाल
मेरी कविता …✍️ सागर की शार्क तुम ठहरे मलय की शीतल - सी बयार, और मैं ज्येष्ठ की दहकती दुपहरी प्रखर। तुममें समाई समंदर -सी अथाह गहराई, जिसकी थाह लेने को आतुर मीन ललचाई । पर मुझमें है सतर्क शार्क-सी तीक्ष्ण चतुराई जिसकी पैनी दृष्टि से कोई मीन ठहर न पाई। ज्यों मधु-कलश पर मंडराती भौरों की पंक्ति, रस-लोभ में करती बारंबार निष्फल प्रयास । पर मैं कमल-पत्र की तीक्ष्ण धार समान, एक स्पर्श में ही रोक दूँ उनका विलास। ज्यों दीपक की लौ पर आकृष्ट पतंगों का दल, प्रभा को पाने को करता उन्मत्त विस्तार । पर मैं उसकी प्रहरी-वज्र-सी अडिग खड़ी, जला दूँ उनके साहस का समस्त अहंकार। ज्यों गुड़ की डली पर चींटियों की लंबी कतार, मिठास के मोह में उमड़ती जाती है बारंबार । पर मैं नागिन-सी बनकर फुफकार उठूँ, और छिन्न कर दूँ उनका सारा विस्तार। तो सुन लो हे मीनों की उत्सुक टोली, इस सागर पर है बस मेरा ही अधिकार । जो रहती हो आतुर यहाँ करने को विहार, यह क्षेत्र है मेरी चौकस पहरेदारी का द्वार। मुस्कुराकर मैं बस इतना कह दूँ— लहरों का आकर्षण चाहे जितना लुभाए, पर शार्क की एक झलक भर से हर मीन दिशा बदलना ही भाए। उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
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