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उषा जरवाल

उषा जरवाल Matrubharti Verified

@usha.jarwal
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उन्मुक्त पंछी

उन्मुक्त पंछी वह नहीं, जो केवल आकाश में उड़ता है,
उन्मुक्त वही है, जो बंधन की कल्पना से भी मुक्त होता है।
जिसकी दृष्टि अवरोधों पर नहीं, शिखरों पर टिकी रहती है,
जिसकी चेतना भय की छाया को तिरस्कृत कर देती है।

आँधियाँ उसके पंखों को थकाने आती हैं,
पर वह उन्हें साधकर अपनी दिशा रच लेता है।
प्रहार उसे विचलित नहीं करते,
वे तो उसके संकल्प को और कठोर बनाते हैं।

वह गिरता है, टूटता है, फिर भी उठ खड़ा होता है,
क्योंकि उसकी आत्मा समझौते की भाषा नहीं जानती।
न पिंजरे की सुविधा उसे लुभाती है,
न सुरक्षित नीड़ उसे रोक पाता है।

उसकी उड़ान प्रश्नों से नहीं, उत्तरों से जन्म लेती है,
और उसका लक्ष्य क्षितिज नहीं—शिखर होता है।
जो हर बाधा को लाँघकर भी अपनी पहचान न खोए,
वही उन्मुक्त पंछी स्वतंत्रता का जीवंत घोष है।

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उन्मुक्त पंछी वह है, जो बंधन-भ्रम का त्याग कर देता है,
अपनी चेतना से भय और विघ्नों को लाँघ आगे बढ़ जाता है।
आघातों की ज्वाला में तपकर भी जिसकी उड़ान अक्षुण्ण है,
वह प्रत्येक अवरोध को तिरस्कृत कर शिखराभिमुख है।
जिसका संकल्प ही आकाश हो,
उसकी स्वच्छंद उड़ान ही उसकी पहचान है।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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जो वास्तव में अपने होते हैं वो हमारी हर ख़ुशी में शामिल होने के मौक़े ढूँढ़ लेते हैं ।
निमंत्रण की आवश्यकता तो बेगानों को पड़ती है ।
उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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जब किसी चीज़ का भाव बढ़ जाता है तो लोग उसे खरीदना बंद कर देते हैं तो कुछ ही दिनों में उस चीज़ के भाव गिरने लगते हैं ।
बस ऐसा ही कुछ ज़िंदगी में होता है । जो बेवजह भाव खाए…. उसे भाव देना बंद कर दो, सारे भाव गिरने लगेंगे ।
- उषा जरवाल

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नज़र से नज़र मिलाकर तुम कुछ ऐसी नज़र लगा गए ,
ख़ुद नज़र आए नहीं और हम सबकी नज़र में आ गए ।
जब मिली फिर से ये कमबख़्त नज़रें हमारी तो फिर सब नज़रअंदाज़ हो गए ।

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जीवन में कितना भी तनाव क्यों न हो, मुस्कुराते रहिए ।
आपके लटके हुए चेहरे को देखकर आपका तनाव तो जाने से रहा फिर क्यों मुँह लटकाकर दूसरों को तनाव देना ?।
उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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सब लोगों को खुश रखने का प्रयास मत करिए ।
नज़रों में रहने के लिए कुछ नाराज़गी भी ज़रूरी है ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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सब पढ़ाया गया हमें - त्रिकोण, चौकोर, पंचकोण, षट्कोण, समकोण, लघुकोण पर जो जीवन में सबसे अधिक उपयोगी था वही नहीं पढ़ाया गया - दृष्टिकोण ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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समय कितना बदल गया है ? इससे समझिए - 80 के दशक में - “घर में चार बच्चे, लगे सबको अच्छे ।”
90 में - “हम दो हमारे दो ।”
2000 में - “शेर का बच्चा, एक ही अच्छा ।”
आने वाली पीढ़ी में - “ना बच्चा हो ना बच्ची , तभी नींद आए अच्छी ।”
- उषा जरवाल

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जीवन में तीन प्रकार के लोगों को हमेशा याद रखिए -
॰ पहला, जिसने मुश्किल समय में आपकी मदद की ।
॰ दूसरा, जिसने आपको मुश्किल समय में छोड़ दिया ।
॰ तीसरा, जिसने आपको मुश्किल समय में डाला ।
उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी)

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