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ढलती शाम के साथ कभी - कभी मन हार जाता है पर ज़िम्मेदारियाँ धीरे - से आकर कहती हैं -“चल तेरे बिना चैन - से सब कौन संभालेगा? उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
अल्हड़ - सी… मैं अनमनी अगर मैं ख़ुद पर कुछ लिखती, तो लिखती—लाजवाब हूँ मैं… ना किसी से कम, ना किसी से ज़्यादा, बस अपनी ही एक किताब हूँ मैं। कभी हल्की-सी मुस्कान हूँ, कभी ख़ुद से ही सवाल हूँ मैं, कभी ख़ामोशियों में सिमटी, कभी शब्दों का बवाल हूँ मैं। जो समझ पाए मुझे पूरी तरह, शायद इतनी भी आसान नहीं हूँ मैं, कुछ पन्ने खुले हुए हैं मेरे, कुछ में ख़ुद से भी अनजान हूँ मैं। अपनी ही धुन में चलती हूँ, ना रुकी हूँ, ना थमी हूँ मैं, गिरकर भी फिर सँभल जाती हूँ, क्योंकि ख़ुद की ही कमी नहीं हूँ मैं। दुनिया चाहे कहती रहे, राह चुनती हूँ मैं, शोर से दूर रहकर, काम में रत रहती हूँ मैं। मुझे काम से प्रेम है, उसी में ख़ुशियाँ पाती हूँ मैं, दुनिया के हिसाब से चलूँ तो कहाँ ख़ुश रह पाती हूँ मैं। हर बात को नज़रअंदाज़ कर, कर्म में रमती हूँ मैं, जैसी हूँ, वैसी ही रहना चाहती हूँ, कभी नहीं बदलती हूँ मैं। किसी की ख़ातिर स्वभाव बदलना मेरी फ़ितरत नहीं, जिसे बदलना है, नज़रिया बदले—मैं किसी की आदत नहीं। अगर ख़ुद को लिख पाती, तो लिखती—एक ख़ूबसूरत एहसास हूँ मैं, जो समझे, उसके लिए अपनापन, जो न समझे, उसके लिए बस एक राज़ हूँ मैं। जो मेरी ख़ामोशी पढ़ सके, जो मेरी मुस्कान के पीछे का दर्द समझ सके, जो बिना कहे मेरे मन की बात जान सके— उन चुनिंदा लोगों के लिए दिल के सबसे ख़ास अंदाज़ हूँ मैं। और जो न समझ पाए मुझे, जो अपनी सोच से मुझे आँकते रहें, जो मेरे बारे में कुछ भी कहते रहें— अब उनकी बातों से कहाँ उलझती हूँ मैं, हर आवाज़ का जवाब देना अपनी फ़ितरत नहीं समझती हूँ मैं। क्योंकि अब अपनी ज़िंदगी लोगों की राय से नहीं, अपने मन की आवाज़ से जीती हूँ मैं। जो सही लगे, वही करती हूँ, जो दिल कहे, उसी राह पर चलती हूँ मैं। किसी को पसंद आऊँ या नहीं, अब इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, हर किसी की उम्मीदों पर खरा उतरना मेरा कोई फ़र्ज़ नहीं बनता। जो मेरे साथ सच्चे मन से चले, उसके लिए दिल से ख़ास हूँ मैं, जो मेरे मौन को भी समझ ले, उसके लिए एक ख़ूबसूरत एहसास हूँ मैं। और जो मुझे समझना ही न चाहे, उसके लिए न कोई शिकायत है, न सवाल— बस ख़ामोशी से उसकी दुनिया से नज़रअंदाज़ होकर निकल जाती हूँ मैं। ना सफ़ाई देने का शौक़ है, ना ख़ुद को साबित करने की चाह, मैं जैसी हूँ, वैसी ही मुकम्मल हूँ— यही है मेरी सबसे बड़ी पहचान। अगर मैं ख़ुद पर कुछ लिखती, तो बस इतना लिखती— जो मुझे समझे, उसके लिए खुली किताब हूँ मैं, जो दिल से पढ़े, उसके लिए ख़ास हूँ मैं, जो न पढ़ पाए, उसके लिए नज़रअंदाज़ हूँ मैं… और सबसे बढ़कर— किसी के हिसाब से नहीं, अपने मन की दुनिया में जीती अपनी ही एक ख़ूबसूरत किताब हूँ मैं
सिर्फ़ तुम जब जीवन की राहों पर अनिश्चितताओं के बादल घिरते हैं, तुम्हारे होने भर से मेरे भीतर दीप प्रज्वलित होते हैं। तुम वह मौन आश्वासन हो, जो शब्दों का मोहताज नहीं, वह अटूट विश्वास हो, जिसके आगे कोई भय ठहरता नहीं। मेरी हर उच्छृंखल इच्छा को तुमने स्नेह से दिशा दी, मेरी हर नमी को अपनी हथेली पर रखकर हँसी दी। तुम्हारे साथ चलूँ तो लगता है—आकाश मेरी मुट्ठी में है, हर कठिनाई क्षणभंगुर और हर स्वप्न मेरी दृष्टि में है। तुम मेरे जीवन का वह अडिग तट हो, जहाँ लौटकर मन अपनी सारी थकान, सारी व्याकुलता चुपचाप रख देता है। तुम प्रेम से कहीं अधिक हो—मेरे निडर होने का कारण हो, मेरी मुस्कान का मौन रहस्य, मेरे जीवन का सबसे सुंदर विश्वास हो। जन्मदिन पर तुम्हें क्या दूँ—मेरे पास तो बस यह हृदय है, जिसकी हर धड़कन आज भी तुम्हारे होने को अपना सौभाग्य कहती है।
तुम्हारा सुकून … ❤️ जब तुम थक जाओ और दुनिया तुम्हें अंदर तक थका दे, तो मेरे पास लौट आना… तुम्हें कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होगी, बस अपना सिर मेरे कंधे पर रख देना। तुम्हें हर बार मज़बूत बने रहने की ज़रूरत नहीं है, कभी मेरे सामने बिखर भी जाना… मैं तुम्हें समेटने का वादा तो नहीं करूँगी, पर तुम्हें बिखरने में कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी। और अगर कभी पूरी दुनिया तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो बस मेरा हाथ थाम लेना… मैं हमेशा तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी, हर परिस्थिति में हर मोड़ पर, अंत तक… ❤️ तुम्हारी … सावी
तुम हो तो मैं हूँ … अगर मैं कभी बिखर जाऊँ तो … तुम मुझे समेट लेना । अगर मैं हारने लगूँ तो … अपनी बाँहों में मुझे लपेट लेना । अगर मैं अपना दर्द कह न पाऊँ तो … कुछ मत पूछना,बस मेरा हाथ थामकर मेरे पास बैठ जाना । अगर रात मेरी आँखों से नींद छीन ले तो … मेरे सिर पर अपना हाथ फेर देना । और जब मैं थककर सो जाऊँ तो … मेरा हाथ थामे तुम भी सो जाना । मुझे तुमसे कुछ ज़्यादा नहीं चाहिए, बस इतना वादा करना— ज़िंदगी चाहे जैसे भी मोड़ ले, तुम मेरा साथ न छोड़ना । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
यदि आप जान जाएँ कि आपकी अनुपस्थिति में आपके बारे में क्या कहा गया था तो आप बहुत से लोगों के साथ मुस्कुराना छोड़ देंगे । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
फालतू बैठे लोग एक नन्ही - सी चींटी 🐜 का रास्ता रोककर कहते हैं - “बोल अब किधर से जाएगी?” और तुम्हें लगता है कि तुम यूँ ही अपनी मंज़िल तक पहुँच जाओगे । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
चिड़िया का घोंसला तोड़ा जा सकता है लेकिन घोंसला बनाने की उसकी क्षमता को नहीं । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
प्यासे ने पानी को ‘अमृत’ कहा तो डूबते हुए शख़्स ने ‘ज़हर’ पानी वही है, बस मात्रा का भान ही अलग बना देता है । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
ज़िंदगी इतनी साफ़ नीयत से जियो कि अगर कोई तुमसे कहे ,”तुम्हारे कर्म ही तुम्हें लौटकर मिलेंगे ।” तो डर नहीं सुकून महसूस हो । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’
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