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उषा जरवाल

उषा जरवाल Matrubharti Verified

@usha.jarwal
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मेरा घर कहाँ है?

मायके की देहरी ने धीमे से कहा—
“बिटिया, अब तू पराई हो गई।”
ससुराल की चौखट ने भौंहें चढ़ाकर पूछा—
“तू इतना इठलाती ये तेरा घर है क्या?”
दो आँगनों के बीच झूलती रही मैं,
जैसे प्रश्न कोई, जिसका उत्तर किसी के पास नहीं।
एक ने जन्म दिया, पर अधिकार सीमित कर दिया,
दूसरे ने अधिकार माँगा, पर अपनापन तौलता रहा।
पर अब मैं पूछती नहीं—घोषणा करती हूँ,
मैं स्वयं अपनी देहरी, स्वयं अपना आकाश हूँ।
नारी हूँ—कमज़ोर नहीं, संकल्प की ज्योति हूँ,
अब मैं खामोश नहीं—तीव्र स्वर बन चुकी हूँ,
अब किसी देहरी की मोहताज नहीं रही।
मैं नारी हूँ—अपना घर खुद रच लेने वाली,
जहाँ कदम टिक जाएँ मेरे—वही संसार बना देती हूँ।
अब मुझसे मत पूछो—“तेरा घर कहाँ है?”
मैं जहाँ खड़ी हो जाऊँ—वहीं घर खड़ा कर देती हूँ।
किंतु अब मौन मेरा विवशता नहीं—संकल्प बन चुका है,
अश्रु नहीं, अब नेत्रों में तेज का प्रकाश है।
मैं आज की नारी हूँ—अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति,
प्रचंड तूफानों में भी अपनी नौका पार लगा सकती हूँ।
जिसे तुम पराया कहते रहे युगों से—
वही आज स्वयं अपना संसार रच सकती हूँ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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ऐ ज़िंदगी ! चाहे कितने भी हों तेरे चोचले,
परवाह नहीं, क्योंकि बुलंद हैं मेरे हौसले । 😎

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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टूट गए तो क्या हुआ ?
एक दिन फिर से जुड़ जाएँगे ।
पंख नहीं हैं तो न सही ,
हम पैरों से उड़ जाएँगे ।
पैरों ने भी न दिया साथ तो बेचारा न समझना ,
हम हौंसले वाले हैं जनाब !
लड़ना पड़ा तो हम फ़ौलाद से भी टकरा जाएँगे ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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व्याकरण की रचना करने वालों को हर उस चीज़ में जिसमें नाज़ुकता दिखी उसमें उन्हें स्त्रीत्व दिखा ।
गुलाब के फूल में नाज़ुक पंखुड़ियाँ दिखी तो स्त्रीलिंग और काँटे दिखे तो पुल्लिंग हो गया ।
जब पानी मीठा रहा तो नदी स्त्रीलिंग और खारा हुआ तो सागर पुल्लिंग बन गया ।
जब पानी आसमान में बहुत दूर रहा तो बादल पुल्लिंग और धरती पर बरस पड़ा तो बारिश स्त्रीलिंग हो गई ।
हवा चलती है और तूफ़ान आता है ।
युद्ध होता है और शांति होती है ।
क्रोध उत्पन्न होता है और क्षमा दी जाती है ।
अंत में उन्हीं व्याकरण रचने वालों ने नारी को ‘अबला’ की संज्ञा भी दे दी ।
जो स्वयं शक्ति स्वरूप है, साक्षात महादेव भी जिनके क्रोध से बच नहीं पाए वो नारी भला अबला कैसे हो सकती है ।
मेरे विचार से जो अच्छे से अच्छे सूरमाओं का तबला बजा सकती है वो अबला तो कदापि नहीं हो सकती ।

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उपवन होने का गुमान हो गया है तुम्हें लेकिन सच तो ये है कि एक फूल भी नहीं हो तुम ।
कल्पवृक्ष होने का वहम पाले बैठे हो तो ठीक से पहचान लो कि बबूल भी नहीं हो तुम ।
स्वयं को शिखर कलश मानते हो पर धर्म की धरोहर का मूल भी नहीं हो तुम ।
मुझमें दोष निकालने वालो ख़ुद को भी परख लो तुम
क्योंकि मुझे आँक सको इतने भी मुकम्मल नहीं हो तुम।
😎
- उषा जरवाल

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मेरी कविता …✍️
सागर की शार्क

तुम ठहरे मलय की शीतल - सी बयार,
और मैं ज्येष्ठ की दहकती दुपहरी प्रखर।
तुममें समाई समंदर -सी अथाह गहराई,
जिसकी थाह लेने को आतुर मीन ललचाई ।
पर मुझमें है सतर्क शार्क-सी तीक्ष्ण चतुराई
जिसकी पैनी दृष्टि से कोई मीन ठहर न पाई।

ज्यों मधु-कलश पर मंडराती भौरों की पंक्ति,
रस-लोभ में करती बारंबार निष्फल प्रयास ।
पर मैं कमल-पत्र की तीक्ष्ण धार समान,
एक स्पर्श में ही रोक दूँ उनका विलास।

ज्यों दीपक की लौ पर आकृष्ट पतंगों का दल,
प्रभा को पाने को करता उन्मत्त विस्तार ।
पर मैं उसकी प्रहरी-वज्र-सी अडिग खड़ी,
जला दूँ उनके साहस का समस्त अहंकार।

ज्यों गुड़ की डली पर चींटियों की लंबी कतार,
मिठास के मोह में उमड़ती जाती है बारंबार ।
पर मैं नागिन-सी बनकर फुफकार उठूँ,
और छिन्न कर दूँ उनका सारा विस्तार।

तो सुन लो हे मीनों की उत्सुक टोली,
इस सागर पर है बस मेरा ही अधिकार ।
जो रहती हो आतुर यहाँ करने को विहार,
यह क्षेत्र है मेरी चौकस पहरेदारी का द्वार।

मुस्कुराकर मैं बस इतना कह दूँ—
लहरों का आकर्षण चाहे जितना लुभाए,
पर शार्क की एक झलक भर से
हर मीन दिशा बदलना ही भाए।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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आज हमने अपने विद्यालय का प्रथम एवं सफल शैक्षणिक सत्र पूर्ण किया। यह सत्र सफलतापूर्वक पूर्ण करना केवल एक उपलब्धि नहीं है बल्कि माननीय पदासीन अधिकारियों द्वारा दिया गया उचित मार्गदर्शन, परिश्रम, अथक प्रयास एवं सामुदायिक सहयोग का परिणाम है। इस कार्यकाल के दौरान हमने अनेक त्रुटियाँ कीं, अनेक चुनौतियों का सामना किया और प्रत्येक कठिनाई को एक अवसर में रूपांतरित कर दिया।
इस सत्र ने हमें अनुभूति कराई कि सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए अपने अथक परिश्रम, आपसी सहयोग एवं अनवरत प्रयास से हम सफलता के नए आयाम स्थापित करने के लिए सक्षम हैं ।
हमें विश्वास है कि इसी समर्पण एवं एकजुटता के साथ हम आगामी सत्रों में और अधिक उत्कृष्ट उपलब्धियाँ अर्जित करेंगे।
विद्यालय परिवार के प्रत्येक सदस्य का योगदान इस सफलता की आधारशिला रहा है, जिसके लिए हम हृदय से कृतज्ञ हैं।
आइए, इसी उत्साह, अनुशासन एवं दृढ़ संकल्प के साथ हम भविष्य की ओर अग्रसर हों और शिक्षा के पथ पर निरंतर प्रगति के नवीन इतिहास रचने के लिए तत्पर हों ।

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खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है
मेरी बढ़ती उम्र का अनुभव - जल
वक्त की बरसात थमने का नाम नहीं ले रही
पर मेरा साहस खड़ा है, अडिग, अचल…
चेहरे पर उभरती रेखाएँ कहती हैं,
कि हर वर्ष ने मुझे और निखारा है…
थकते कदमों के बावजूद भी मैंने
काम से अपना नाता और संवारा है…
भागते वक्त की तेज़ हवाओं में भी
मेरा जुनून दीपक-सा जलता रहा…
अब उम्र नहीं, मेरा हौसला बोलता है—
हर ढलती साँझ में मैं और सँवरती रही ।

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एक घर के आँगन में बहुत सारे पौधे लगे हुए थे जिन्हें इनके माली ने मेहनत, लगन और स्नेहमयी स्पर्श देकर सींचा था । समय के साथ उन पौधों के आँगन अलग हो गए और वे नई मिट्टी में जाकर अपनी - अपनी दुनिया में ख़ुशी से रहने लगे । सब एक - दूसरे से दूर थे लेकिन जब तक माली था तब तक अपनेपन की बयार ने उन्हें एक - दूसरे से जोड़कर रखा था ।
एक दिन माली चला गया और धीरे - धीरे उनके बीच जो अपनेपन की डोर थी वो खिंचती चली गई । डोर इतनी दूर तक खिंच चुकी थी कि अब हवा ने भी उनके बीच आना बंद कर दिया था लेकिन पता नहीं क्यों एक पौधे को विश्वास था कि चाहे जो भी हो जाए लेकिन एक शीतल बयार है जो उसके मुरझाते हुए शरीर में नई चेतना का संचार करती रहेगी । भले ही वह शीतल बयार अपनी राह बदल चुकी है लेकिन उस पौधे की आस अभी भी बनी हुई है ।

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मुझे ‘मैं’ पसंद हूँ ।

यह बिंदी ना लगाया करो ,
यह तुम पर जँचती नहीं ।
गहरे रंग ही पहना करो ,
यह साड़ी तुम पर फबती नहीं ॥
तो सुनो ...
यह बिंदी मैंने लगाई है ,
तो मुझे तो जँचती ही होगी।
यह साड़ी भी मैंने ही खरीदी है,
पहनी है तो मुझे पसंद ही होगी ॥
तुम्हें लाल रंग पसंद है तो ,
पीला रंग खराब है क्या ?
तुम शौक़ीन हो ‘अंग्रेज़ी’ में बड़बड़ाने के,
तो ‘हिंदी’ मेरी बेमिसाल नहीं है क्या ?
इतना तो तुम्हें भी पता ही होगा कि ,
नहीं मिलते दो लोगों के उंगलियों के भी निशान ।
फिर कैसे हो सकती है ?
सभी की पसंद नापसंद एक समान । ।
मेरे शौक को ,मेरे पहनावे को,
मेरे खाने को , मेरे गाने को ,
यूँ बेवजह जज ना तुम किया करो ।
खुद में भी मस्त रहना सीखो ,
हरदम दूसरों में नुक्स निकालने का कष्ट ना तुम किया करो ॥
क्या पता ...
तुम्हारी कोई पसंद भी ,
करोड़ों में से हर एक को रास नहीं हो। ।
तो क्या ?
आज तक जो तुम खुद को ‘ख़ूब’ समझते आए हो ,
मतलब,
तुम भी कुछ खास नहीं हो।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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