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उषा जरवाल

उषा जरवाल Matrubharti Verified

@usha.jarwal
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तुम्हारा सुकून … ❤️

जब तुम थक जाओ और
दुनिया तुम्हें अंदर तक थका दे,
तो मेरे पास लौट आना…
तुम्हें कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होगी,
बस अपना सिर मेरे कंधे पर रख देना।
तुम्हें हर बार
मज़बूत बने रहने की ज़रूरत नहीं है,
कभी मेरे सामने बिखर भी जाना…
मैं तुम्हें समेटने का वादा तो नहीं करूँगी,
पर तुम्हें बिखरने में
कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी।
और अगर कभी
पूरी दुनिया तुम्हारा साथ छोड़ दे,
तो बस मेरा हाथ थाम लेना…
मैं हमेशा तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी,
हर परिस्थिति में हर मोड़ पर,
अंत तक… ❤️

तुम्हारी …
सावी

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तुम हो तो मैं हूँ …

अगर मैं कभी बिखर जाऊँ तो …
तुम मुझे समेट लेना ।
अगर मैं हारने लगूँ तो …
अपनी बाँहों में मुझे लपेट लेना ।
अगर मैं अपना दर्द कह न पाऊँ तो …
कुछ मत पूछना,बस मेरा हाथ थामकर
मेरे पास बैठ जाना ।
अगर रात मेरी आँखों से
नींद छीन ले तो …
मेरे सिर पर अपना हाथ फेर देना ।
और जब मैं थककर सो जाऊँ तो …
मेरा हाथ थामे तुम भी सो जाना ।
मुझे तुमसे कुछ ज़्यादा नहीं चाहिए,
बस इतना वादा करना—
ज़िंदगी चाहे जैसे भी मोड़ ले,
तुम मेरा साथ न छोड़ना ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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यदि आप जान जाएँ कि आपकी अनुपस्थिति में आपके बारे में क्या कहा गया था तो आप बहुत से लोगों के साथ मुस्कुराना छोड़ देंगे ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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फालतू बैठे लोग एक नन्ही - सी चींटी 🐜 का रास्ता रोककर कहते हैं - “बोल अब किधर से जाएगी?” और तुम्हें लगता है कि तुम यूँ ही अपनी मंज़िल तक पहुँच जाओगे ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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चिड़िया का घोंसला तोड़ा जा सकता है लेकिन
घोंसला बनाने की उसकी क्षमता को नहीं ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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प्यासे ने पानी को ‘अमृत’ कहा तो डूबते हुए शख़्स ने ‘ज़हर’
पानी वही है, बस मात्रा का भान ही अलग बना देता है ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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ज़िंदगी इतनी साफ़ नीयत से जियो कि अगर कोई तुमसे कहे ,”तुम्हारे कर्म ही तुम्हें लौटकर मिलेंगे ।”
तो डर नहीं सुकून महसूस हो ।

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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उबलता हुआ पानी भी सोचता होगा …. यदि बीच में बरतन ना होता तो आग का क्या होता ?

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

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प्रचण्ड प्रभाकर ज्वाला बरसाए,
धरा दग्ध हो व्यथा सुनाए।
तप्त पवन के तीक्ष्ण प्रहारों से,
व्याकुल हो उठता संसारा।

दिग्दिगंत दहके दावानल-सा,
छाया भी शरण न दे पाती,
स्वेद-बिंदुओं की सरिता बहती,
निद्रा पलकों से डर जाती।

तभी किसी प्रतिभा-पुरुष ने,
शीतल यंत्र-विज्ञान रचाया,
अहंकारी आदित्य के सम्मुख,
हिम-स्पर्शी साम्राज्य बसाया।

अब सूर्य सहस्र किरणें फेंके,
गृह के भीतर शिशिर समाया,
जिसने वातानुकूलन गढ़ डाला,
उसने सचमुच सूर्य हराया।

उषा जरवाल ‘ एक उन्मुक्त पंछी’

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“साधारण सी स्त्री”

तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा…
मैं एक साधारण सी स्त्री हूँ, हठी बहुत हूँ मैं।
ना मैं सती, ना उर्वशी,
मैं एक साधारण सी स्त्री, बावली बहुत हूँ मैं।
तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा।
मैं अट्ट स्वाभिमानी, बहुत बोलने वाली,
अगर रूठ जाऊँ तो घंटों चुप रहने वाली।
छोटी-छोटी बातों पर खिन्न हो जाने वाली,
बेवजह हँसने वाली, बेहिसाब रोने वाली,
बहुत ज़्यादा सोचने वाली…
तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा…
मैं एक साधारण सी स्त्री हूँ, हठी बहुत हूँ मैं।
अगर चरित्र पर बात आ जाए तो
आक्रामक बहुत हूँ मैं,
खुद के लिए मशाल
और खुद में क्रांति बहुत हूँ मैं।
तो कौन करेगा मुझसे प्रेम पागलों सा…
मैं एक साधारण सी स्त्री हूँ, हठी बहुत हूँ मैं।
स्वाभिमान मेरी प्रथम धरोहर,
उसकी रक्षा ही मेरा श्रृंगार है।
मैं झुकूँ प्रेम में सौ बार मगर,
अपमान पर मौन रहना अस्वीकार है।
मैं कोमल हूँ, पर दुर्बल बिल्कुल नहीं,
अपने सम्मान की प्रहरी हर बार हूँ मैं।
हाँ, एक साधारण सी स्त्री हूँ मैं,
पर स्वाभिमान से ही साकार हूँ मैं।

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