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Kushal K Pawar

Kushal K Pawar

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असीमित पुण्य

गुजरात की एक प्रसिद्ध रियासत में राजमाता मीलण देवी रहती थीं। वह भगवान के प्रति अत्यंत श्रद्धालु थीं और धर्म-कर्म में उनका विशेष विश्वास था। एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि वह भगवान सोमनाथ जी का भव्य अभिषेक और पूजन करेंगी। पूरे विधि-विधान के साथ उन्होंने मंदिर में पूजा-अर्चना की। इसके बाद उन्होंने सोने का तुलादान कराया—अपने वजन के बराबर सोना तुला पर रखकर भगवान को अर्पित कर दिया। मंदिर में उपस्थित सभी लोग राजमाता की भक्ति और दान देखकर उनकी प्रशंसा करने लगे।

इतना बड़ा दान करने के बाद धीरे-धीरे राजमाता के मन में अहंकार आने लगा। वह मन ही मन सोचने लगीं कि आज तक किसी ने इतना बड़ा तुलादान नहीं किया होगा और उन्होंने बहुत बड़ा पुण्य कमा लिया है। इस विचार के साथ वह अपने महल लौट आईं और रात को विश्राम करने लगीं।

रात में उन्हें एक अद्भुत स्वप्न आया। उन्होंने देखा कि स्वयं भगवान सोमनाथ उनके सामने खड़े हैं। भगवान ने शांत स्वर में कहा, “राजमाता, मेरे मंदिर में एक गरीब महिला दर्शन के लिए आई है। उसके पास असीमित पुण्य संचित हैं। तुम उससे कुछ पुण्य सोने की मुद्राएं देकर खरीद लो, क्योंकि वही तुम्हारे परलोक में काम आएंगे।”

इतना कहकर भगवान अदृश्य हो गए। राजमाता की नींद खुल गई और वह बेचैन हो उठीं। सुबह होते ही उन्होंने अपने सेवकों को आदेश दिया कि मंदिर में जो गरीब महिला आई है, उसे तुरंत राजभवन लाया जाए।

सेवक मंदिर पहुंचे और खोजबीन करके उस गरीब महिला को राजमहल ले आए। वह महिला अत्यंत गरीब थी और साधारण कपड़े पहने हुए थी। राजमहल का वैभव देखकर वह डर से कांपने लगी। राजमाता ने उसे प्रेमपूर्वक अपने पास बैठाया और कहा, “मुझे अपने संचित पुण्य दे दो, बदले में मैं तुम्हें बहुत सारी सोने की मुद्राएं दूंगी।”

राजमाता की बात सुनकर गरीब महिला आश्चर्य में पड़ गई। वह विनम्रता से बोली, “महारानी जी, मैं तो एक गरीब भिखारिन हूं। मुझसे भला कौन-से पुण्य कार्य हो सकते हैं? मैं तो दर-दर भीख मांगकर अपना पेट भरती हूं। कल मुझे भीख में एक मुट्ठी सत्तू मिले थे। मंदिर में दर्शन करने से पहले मैंने उनमें से आधे सत्तू भगवान को भोग लगा दिए और बाकी आधे एक भूखे भिखारी को खिला दिए। जब मैं भगवान को ठीक से प्रसाद भी नहीं चढ़ा पाई, तो मुझे पुण्य कहां से मिलेगा?”

गरीब महिला की यह सरल और निष्कपट बात सुनकर राजमाता स्तब्ध रह गईं। उसी क्षण उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने समझ लिया कि भगवान को दिखावे या बड़े दान से नहीं, बल्कि सच्चे मन और नि:स्वार्थ भावना से प्रसन्न किया जा सकता है। उस गरीब महिला ने जो थोड़ा-सा अन्न भगवान और एक भूखे व्यक्ति को दिया, वही सच्ची भक्ति थी, और उसी से उसे असीमित पुण्य प्राप्त हुआ।

राजमाता का अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया। उन्होंने उसी समय प्रण लिया कि अब वह अहंकार को त्यागकर मानव सेवा को ही अपना सबसे बड़ा धर्म बनाएंगी। इसके बाद उन्होंने गरीबों, भूखों और जरूरतमंदों की सेवा करना शुरू कर दिया और सच्चे मन से समाज के कल्याण में अपना जीवन समर्पित कर दिया।

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सावन में यूं फिर
एक
उम्मीद पाली है मैंने
तेरे
पते पर फिर
एक
चिट्ठी डाली है मैंने ....

कागज़ भीग जाए तो कोई बात नहीं,
स्याही मिट जाए तो कोई गम नहीं।
बस डाकिया ये बता दे एक बार...
कि मेरे लफ्ज़ों को तूने पढ़ा कि नहीं।
- Kushal K Pawar

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तेरे नाम,
तेरे दिल के कोने में,
जहाँ मेरी यादें रहती हैं।

मेरे चाँद,
सावन में यूं फिर
एक उम्मीद पाली है मैंने
तेरे पते पर फिर
एक चिट्ठी डाली है मैंने....

कागज़ भीग जाए तो कोई बात नहीं,
स्याही मिट जाए तो कोई गम नहीं।
बस डाकिया ये बता दे एक बार...
कि मेरे लफ्ज़ों को तूने पढ़ा कि नहीं।

बारिश की हर बूंद में तेरा नाम है,
और हर बूंद के साथ एक दुआ तेरे नाम।
जल्दी जवाब भेजना,
इंतज़ार में भीगा जा रही हूँ मैं।

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वो दोस्त

दोस्ती का मतलब सिर्फ हँसी नहीं होता,
कभी-कभी वो एक कंधा भी होता है...
जहाँ बिना बोले आँसू रुक जाते हैं।

वो जो कहता था "टेंशन मत ले, मैं हूँ ना"
आज उसी के नंबर पर "Last Seen" देखकर
दिल भर आता है।

स्कूल की बेंच, कॉलेज की कैंटीन,
आधी रात के फोन, और "भाई रुक" वाली बातें...
सब था।
बस "हम" नहीं रहे।

सबसे ज्यादा दर्द तब होता है,
जब अपना वाला पराया हो जाए।
ना लड़ाई, ना गलती...
बस वक्त ने अपनी "ईंट" खींच ली।

आज भी भीड़ में कोई उसका नाम ले ले,
तो सीने में अजीब सी टीस उठती है।
सोचता हूँ फोन कर लूँ...
फिर याद आता है - "अब वो अपना नहीं रहा"

दोस्ती टूटती नहीं है यार,
बस धीरे-धीरे सांस लेना बंद कर देती है।
और हम...
पुरानी चैट पढ़कर सो जाते हैं।

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"ईंट"

रिश्तों की
नींव अचानक
नहीं हिलती...

धीरे-धीरे दरकती है,
एक खामोश दरार की तरह।
हिलती तब है,

जब भरोसे की ईंट पर
शक की दरार आ जाती है,
जब वक्त की ईंट को
"फुर्सत नहीं" निगल जाता है।

जब हर कोई
अपने हिस्से की

_"ईंट"_
खींच लेता है..!!

कोई इज्जत की ईंट ले जाता है,
कोई अपनापन वाली।
कोई छोटी सी बात पर
अपना हक जताकर निकल जाता है।

और एक दिन
महल भरभराकर गिर पड़ता है...
ना शोर होता है,
ना कोई कसूरवार।

बस मलबे में दबी रह जाती हैं
वो यादें...
जिन्हें जोड़ने के लिए
किसी ने अपनी पूरी उम्र लगा दी थी।

इसलिए रिश्ते निभाना
ताजमहल बनाना है,
रोज एक ईंट लगानी पड़ती है।
वरना लोग आते हैं...
और अपनी ईंट के साथ
तुम्हारा सुकून भी ले जाते हैं।

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आज वापस ले आया डाकिया खत मेरा।
हाथ में पीला पड़ चुका लिफाफा था।
ऊपर तुम्हारा नाम, नीचे मेरा पता।
और कोने में लाल स्याही से लिखा था -

_बोला पता सही था लेकिन लोग बदल गए.._

मैंने पूछा, "कब से?"
डाकिया बोला, "पता नहीं साहब।
पिछले 3 महीने से हर हफ्ते यही खत आता है।
पहले गेट पर ताला था।
फिर ताले पर नया नाम।
अब तो घर में किराएदार रहते हैं।"

मैंने लिफाफा खोला।
3 पन्ने थे।
पहले पन्ने पर लिखा था - "तुम्हारे बिना नींद नहीं आती"
दूसरे पर - "तुम्हारी हंसी के बिना चाय फीकी लगती है"
तीसरे पर - "लौट आओ, सब माफ कर दूंगा"

स्याही अभी भी गीली थी।
शायद आंसुओं की वजह से।
या शायद इसलिए कि इंतज़ार कभी सूखता ही नहीं।

मैं उस घर के सामने घंटों खड़ा रहा।
खिड़की वही थी जहां तुम चाय पीती थी।
दीवार वही थी जहां तुम्हारी परछाई बनती थी।
बस तुम नहीं थी।

डाकिया चला गया।
मैंने खत जेब में रखा और घर आ गया।
अब वो खत मेरी डायरी में है।
न भेजा गया, न फाड़ा गया।

क्योंकि कुछ खत मंजिल तक नहीं पहुंचते।
वो हमें ही मंजिल बना देते हैं।
और कुछ लोग...
पते सही होने के बाद भी
गलत हो जाते हैं..


Kushal K Pawar...

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आज वापस ले आया डाकिया खत मेरा

*वर्जन 1 - दर्द वाला:*
आज वापस ले आया डाकिया खत मेरा
बोला पता सही था लेकिन लोग बदल गए..
वो खिड़की अब भी वही है,
वो नाम की तख्ती भी वही है,
बस दस्तक देने वाला अब कोई नहीं रहा..

*वर्जन 2 - शायराना:*
आज वापस ले आया डाकिया खत मेरा
बोला पता सही था लेकिन लोग बदल गए..
स्याही अभी गीली थी मेरे आंसुओं से,
और लिफाफे पर अब भी तुम्हारे नाम की खुशबू थी..
पर तुम अब उस घर में नहीं रहते थे।

- कुशल पवार...

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