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इजाज़त दे, जब तू मेरे सीने पर सिर रखे तो मैं अपनी साँसों की गर्माहट तेरे बालों पर टिका दूँ तेरे माथे पर जमी हर छोटी-बड़ी थकान को धीमे-धीमे, बेइंतिहा नर्मी से अपने स्पर्श में समेट लूँ तेरी पीठ पर रखा मेरा हाथ तेरी धड़कनों की रफ़्तार पढ़े, जैसे तू डर-डर कर नहीं, पूरे यक़ीन से मेरी बाँहों में सिमट आई हो हो इजाज़त, तो मैं इस सिमटने को तुझमें और गहरा उतरने दूँ , बिना कहे, बिना माँगे, बस महसूस करने दूं , तेरे कंधे और गर्दन के उस मोड़ पर जहाँ रातें नरम होती हैं, मुझे अपना सुकून रख लेने दे
मुझे फिर याद आती है वह अटल जी की कविता पन्द्रह अगस्त का दिन कहता आज़ादी अभी अधूरी है सपने सच होने बाकी हैं, राखी की शपथ न पूरी है॥ जिनकी लाशों पर पग धर कर आज़ादी भारत में आई वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥ कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं, हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहां कुचली जाती॥ इंसान जहां बेचा जाता, ईमान खरीदा जाता है इस्लाम सिसकियां भरता है, डॉलर मन में मुस्काता है॥ भूखों को गोली नंगों को हथियार पहनाए जाते हैं सूखे कण्ठों से ज़िहादी नारे लगवाए जाते हैं॥ लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया पख़्तूनों पर, गिलगित पर है गमगीन गुलामी का साया॥ बस इसीलिए तो कहता हूं आज़ादी अभी अधूरी है कैसे उल्लास मनाऊं मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥ दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएंगे, दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएंगे जो पाया उसमें खो ना जाएं, जो खोया उसका ध्यान करें॥ उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें जो पाया उसमें खो न जाएं, जो खोया उसका ध्यान करें॥
लौटती कविता जब-जब मैं तुम्हें भूलने की कोशिश करता हूँ, एक कविता लौट आती है। वो चुपचाप बैठ जाती है मेरी मेज़ पर रखी अधूरी किताबों के बीच, और तुम्हारा नाम लिख देती है मेरे हर खाली पन्ने पर। मैं उसे मिटाना चाहता हूँ, पर शब्द फिर उग आते हैं, जैसे सूखी धरती पर बरसात की पहली बूंदें। वो कविता लौटती है कभी तुम्हारी हँसी बनकर, कभी तुम्हारी ख़ामोशी बनकर, और कभी एक ऐसे दर्द की तरह जिसका कोई इलाज नहीं होता। समय बहुत आगे निकल आया है, मगर कुछ एहसास आज भी वहीं खड़े हैं, जहाँ तुमने आख़िरी बार मुड़कर देखा था। और तब समझ आता है— कुछ लोग नहीं लौटते, मगर उनकी यादों से जन्मी कविताएँ उम्र भर लौटती रहती हैं।॥
असीमित पुण्य गुजरात की एक प्रसिद्ध रियासत में राजमाता मीलण देवी रहती थीं। वह भगवान के प्रति अत्यंत श्रद्धालु थीं और धर्म-कर्म में उनका विशेष विश्वास था। एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि वह भगवान सोमनाथ जी का भव्य अभिषेक और पूजन करेंगी। पूरे विधि-विधान के साथ उन्होंने मंदिर में पूजा-अर्चना की। इसके बाद उन्होंने सोने का तुलादान कराया—अपने वजन के बराबर सोना तुला पर रखकर भगवान को अर्पित कर दिया। मंदिर में उपस्थित सभी लोग राजमाता की भक्ति और दान देखकर उनकी प्रशंसा करने लगे। इतना बड़ा दान करने के बाद धीरे-धीरे राजमाता के मन में अहंकार आने लगा। वह मन ही मन सोचने लगीं कि आज तक किसी ने इतना बड़ा तुलादान नहीं किया होगा और उन्होंने बहुत बड़ा पुण्य कमा लिया है। इस विचार के साथ वह अपने महल लौट आईं और रात को विश्राम करने लगीं। रात में उन्हें एक अद्भुत स्वप्न आया। उन्होंने देखा कि स्वयं भगवान सोमनाथ उनके सामने खड़े हैं। भगवान ने शांत स्वर में कहा, “राजमाता, मेरे मंदिर में एक गरीब महिला दर्शन के लिए आई है। उसके पास असीमित पुण्य संचित हैं। तुम उससे कुछ पुण्य सोने की मुद्राएं देकर खरीद लो, क्योंकि वही तुम्हारे परलोक में काम आएंगे।” इतना कहकर भगवान अदृश्य हो गए। राजमाता की नींद खुल गई और वह बेचैन हो उठीं। सुबह होते ही उन्होंने अपने सेवकों को आदेश दिया कि मंदिर में जो गरीब महिला आई है, उसे तुरंत राजभवन लाया जाए। सेवक मंदिर पहुंचे और खोजबीन करके उस गरीब महिला को राजमहल ले आए। वह महिला अत्यंत गरीब थी और साधारण कपड़े पहने हुए थी। राजमहल का वैभव देखकर वह डर से कांपने लगी। राजमाता ने उसे प्रेमपूर्वक अपने पास बैठाया और कहा, “मुझे अपने संचित पुण्य दे दो, बदले में मैं तुम्हें बहुत सारी सोने की मुद्राएं दूंगी।” राजमाता की बात सुनकर गरीब महिला आश्चर्य में पड़ गई। वह विनम्रता से बोली, “महारानी जी, मैं तो एक गरीब भिखारिन हूं। मुझसे भला कौन-से पुण्य कार्य हो सकते हैं? मैं तो दर-दर भीख मांगकर अपना पेट भरती हूं। कल मुझे भीख में एक मुट्ठी सत्तू मिले थे। मंदिर में दर्शन करने से पहले मैंने उनमें से आधे सत्तू भगवान को भोग लगा दिए और बाकी आधे एक भूखे भिखारी को खिला दिए। जब मैं भगवान को ठीक से प्रसाद भी नहीं चढ़ा पाई, तो मुझे पुण्य कहां से मिलेगा?” गरीब महिला की यह सरल और निष्कपट बात सुनकर राजमाता स्तब्ध रह गईं। उसी क्षण उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने समझ लिया कि भगवान को दिखावे या बड़े दान से नहीं, बल्कि सच्चे मन और नि:स्वार्थ भावना से प्रसन्न किया जा सकता है। उस गरीब महिला ने जो थोड़ा-सा अन्न भगवान और एक भूखे व्यक्ति को दिया, वही सच्ची भक्ति थी, और उसी से उसे असीमित पुण्य प्राप्त हुआ। राजमाता का अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया। उन्होंने उसी समय प्रण लिया कि अब वह अहंकार को त्यागकर मानव सेवा को ही अपना सबसे बड़ा धर्म बनाएंगी। इसके बाद उन्होंने गरीबों, भूखों और जरूरतमंदों की सेवा करना शुरू कर दिया और सच्चे मन से समाज के कल्याण में अपना जीवन समर्पित कर दिया।
सावन में यूं फिर एक उम्मीद पाली है मैंने तेरे पते पर फिर एक चिट्ठी डाली है मैंने .... कागज़ भीग जाए तो कोई बात नहीं, स्याही मिट जाए तो कोई गम नहीं। बस डाकिया ये बता दे एक बार... कि मेरे लफ्ज़ों को तूने पढ़ा कि नहीं। - Kushal K Pawar
तेरे नाम, तेरे दिल के कोने में, जहाँ मेरी यादें रहती हैं। मेरे चाँद, सावन में यूं फिर एक उम्मीद पाली है मैंने तेरे पते पर फिर एक चिट्ठी डाली है मैंने.... कागज़ भीग जाए तो कोई बात नहीं, स्याही मिट जाए तो कोई गम नहीं। बस डाकिया ये बता दे एक बार... कि मेरे लफ्ज़ों को तूने पढ़ा कि नहीं। बारिश की हर बूंद में तेरा नाम है, और हर बूंद के साथ एक दुआ तेरे नाम। जल्दी जवाब भेजना, इंतज़ार में भीगा जा रही हूँ मैं।
वो दोस्त दोस्ती का मतलब सिर्फ हँसी नहीं होता, कभी-कभी वो एक कंधा भी होता है... जहाँ बिना बोले आँसू रुक जाते हैं। वो जो कहता था "टेंशन मत ले, मैं हूँ ना" आज उसी के नंबर पर "Last Seen" देखकर दिल भर आता है। स्कूल की बेंच, कॉलेज की कैंटीन, आधी रात के फोन, और "भाई रुक" वाली बातें... सब था। बस "हम" नहीं रहे। सबसे ज्यादा दर्द तब होता है, जब अपना वाला पराया हो जाए। ना लड़ाई, ना गलती... बस वक्त ने अपनी "ईंट" खींच ली। आज भी भीड़ में कोई उसका नाम ले ले, तो सीने में अजीब सी टीस उठती है। सोचता हूँ फोन कर लूँ... फिर याद आता है - "अब वो अपना नहीं रहा" दोस्ती टूटती नहीं है यार, बस धीरे-धीरे सांस लेना बंद कर देती है। और हम... पुरानी चैट पढ़कर सो जाते हैं।
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