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@nidhi2574


डम डम डम डम डमरू बाजे
कैलाश पर्वत पे नंदी गण नाचे
सज धज के देवी देवता विराजे

बंदनवारों ,दीप मालाओं से
जगमगा गई है रात
महादेव महाकाल की
सज गई बारात

बम बम भोले
चले होले होले
हिमाचल के द्वारे
लाए खुशियों की सौगात
गौरा को ब्याहन आए
शिव शंभू ले कर बारात

हर हर महादेव का
हो रहा हुंकार
शिव संग गौरा,गौरा संग शिव तुम्हारी
जयजयकार
भक्तों का तुमको
प्रणाम बारंबार

पूर्ण करो सबकी मनोकामना
महापर्व शिवरात्रि की सभी को शुभकामना
🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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🌷 नन्ही कली🌷
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दूर कहीं बाग के किसी कोने में
एक नन्हा पौधा तरुणाई में झूम रहा था,
अपनी बाँहें फैलाए आसमान की ओर नित प्रतिदिन ऊँचाइयों को चूम रहा था।

नयी तरंगों नयी उमंगों की कोंपलें उसे श्रृंगारित कर गुनगुना रहीं थीं,
शिशिर शरद हेमन्त धूप बरखा बसंत संग प्यार से खिलखिला रहींथीं।

समय काल परिस्थिति का चक्र अपनी गति से चल रहा था,
आज वो पौधा ख़ुशी से भीअधिक खुश लग रहा था।

हुआ भी था कुछ ऐसा जिससे उसकी रंगत निखार आई थी,
आज उसकी गोद में एक नन्ही कली
मुस्कुराई थी ।

अपनी बाँहों में उसे समेटे वो ख़ुशी के कुलाँचें भर रहा था,
हवा के झोंकों संग प्रेम मग्न हो ममत्व के हिलोरें भर रहा था,
समूचे बाग में वो सबसे भाग्यशाली है यही सोच कर गर्व कर रहा था।

कोमल कली भी अपने को सुरक्षित बाँहों में पाकर धीरे धीरे अपनी नींद से जाग रही थी,
अपनी छोटी छोटी पंखुड़ी को खोल हौले हौले मुस्कुरा रही थी ।

समय के साथ कली के स्वरूप ने भी आकार लिया ,
उसके पल्लवित होने से खुश उस पौधे के मन में कई चिन्ताओं ने बसेरा किया ।

चिंता थी उस आने वाले कल कि,
बिछड़ के दूर जाने वाले उस पल की

इतने जतन से सम्भाला था जिसे
नाज़ों नख़रों से पाला था जिसे ।

वो जो आज है रौनक़ यहाँ की
कल रौशनी बनेगी सारे जहाँ की।

कल जो इसे दूर ले जायेगा मेरी आँखों से ,
क्या सम्भाल पाएगा अपनी पलकों पे ।

कितने धर्म इसे निभाने होंगे ,
क्या क्या ज़ख़्म खाने होंगे।

दुनिया का ये दस्तूर तो निभाना होगा,
कली को अपने कर्म के लिए दूर तो जाना होगा ।

कभी ठोकर खाएगी कभी कभी मुरझायेगी,
पर जी सीख समझ उसे सिखलाई है वही ढाल बन जाएगी ।

जो आज यहाँ की ख़ुशबू है वो कल सारा जहां महकायेगी,
आज इन बाहों में मुस्कुरा रही है कल सारी दुनिया में छा जाएगी ।

ये सोच कर मुस्कुरा कर कली को दुलराते हुए बोला,

ए कली तुम अपने आप को कमज़ोर मत समझना,
हर घड़ी हर हाल में मुझे अपने संग समझना।

हिम्मत और बुद्धि से ही पहचान बनाई जाती है,
अंधकार कितना ही गहरा क्यों ना हो
एक छोटे से दिये की लौ से रोशनी बिखर जाती है ।

इसलिए ना कम हो और ना अपने को कमतर मानो,
जीवन रथ पर ख़ुशियों की लगाम थाम कर सफलता के कदम बढ़ाये चलो बढ़ाये चलो ।

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दिल से दिल को राहत होती है,
दिल की राहों मे मुश्किलात बड़ी होती है।
जो हमराह साथ हो तो, ज़माने का दम निकलता है।
जो तन्हा हो सफर तो, ज़िंदगी दम तोड़ती है।।

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🌹मातृ भाषा –हिंदी🌹
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जैसे
माँ के ललाट पर सुशोभित है बिंदी
वैसे ही
अनुपम है पावन पवित्र है
भाषाओं की रानी हिंदी

भावों की अभिव्यक्ति का है दर्पण
कभी कभी सख़्त तो कभी कभी कोमल
जैसे हो
मां का मन

रस छंद अलंकारों से सुसज्जित है रूपा
स्वर व्यंजन शब्द वाक्यों से बुनी काया
कभी कहीं सौम्य
कभी कहीं चंचल
जैसे हो
मां का लहराता आंचल

पूज्यनीय सम्माननीय परम पुनीता
कवि की कल्पना और लेखकों को लेखनी से लिखी गाथा

करते है प्रणाम,नमन वंदन
मां स्वरूपा मातृभाषा तुझे कोटि कोटि अभिनंदन
🙏🙏

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