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औरतें आखिर चाहती क्या हैं? बस इतना ही तो कि थक जाएँ तो कोई पूछ ले “आज मन ठीक है?” रोई हों तो कारण पूछने की ज़रूरत नहीं, बस आँखों में थोड़ी देर ठहर जाना काफ़ी है। भरी महफ़िल में नाम लेकर बुलाने की नहीं, एक नज़र भर देख लेने की चाह होती है, जो कह दे— “तुम अकेली नहीं हो।” सड़क पार करते हाथ थामने का मतलब हिम्मत देना होता है, और चुपचाप चलने में साथ निभाने का वादा। इन्हें बड़े वादे नहीं चाहिए, बस छोटे-छोटे यकीन चाहिए कि कोई है जो बिना कहे भी साथ खड़ा है। औरतें चाहती हैं बस मन पढ़ लिया जाए, भाव समझ लिया जाए, बिना शब्दों के, बिना शोर के। औरतें चाहती हैं......... डॉ सोनिका शर्मा - Dr Sonika Sharma
लड़के वाले बहुत सरल थे, इतने सरल कि उन्होंने साफ़-साफ़ कह दिया— “हम दहेज नहीं लेते… बस शादी बिना सुविधा के नहीं करते।” लड़की के पिता ने राहत की साँस ली। मन ही मन बोले चलो अच्छा हुआ लालची लोगों से पाला नहीं पड़ा और भगवान का नाम लिया। लड़का पढ़ा-लिखा है। लड़के की माँ ने सूची आगे बढ़ाई “ये कोई दहेज नहीं है, बस कुछ जरूरी व्यवस्थाएँ हैं— कार, फर्नीचर, एसी आदि और हाँ… लड़के की पढ़ाई पर जो खर्च हुआ था, वो तो आपको समझना ही पड़ेगा।” पिता ने सिर हिलाया। समझने की उम्र बहुत पहले निकल चुकी थी। लड़की चाय लेकर आई। उसने कप रखते हुए पूछा “आंटी, क्या इसमें GST लगेगा या ये सब परंपरा के अंतर्गत आता है?” कमरे में गला साफ़ करने की आवाज़ फैल गई। लड़के के पिता मुस्कुराए “बेटी, तुम्हें मज़ाक सूझ रहा है, असल ज़िंदगी में ऐसे सवाल नहीं पूछते।” लड़की बोली— “असल ज़िंदगी में ही तो लड़कियाँ बिकती हैं अंकल।” अब तक कमरे में सन्नाटा पसर चुका था । लड़के ने स्थिति सँभालने की कोशिश की “देखिए, हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है, पर समाज है… लोग सवाल करेंगे।” लड़की ने जवाब दिया— “तो शादी हम कर रहे हैं या समाज?” लड़के की माँ फुसफुसाईं “लड़की ज़्यादा बोलती है।” लड़की मुस्कुरा दी— “हाँ आंटी, इसीलिए मेरी कीमत भी ज़्यादा लग रही है।” लड़की बोली - चाय ठंडी हो गई और रिश्ता भी। लड़के वाले उठे और जाते-जाते लड़की की माँ बोलीं— “ऐसी सोच के साथ लड़की की शादी मुश्किल होती है।” लड़की ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा— "और ऐसी शादियों के साथ लड़की की ज़िंदगी बर्बाद हो जाती हैं।” दरवाज़ा बंद हुआ। लड़की ने चैन की साँस ली.....। - Dr Sonika Sharma
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गणपति जन्म माँ ने खुद से तुमको गढ़ा, खुद के उबटन से रूप सँवारा, भक्ति-प्रेम की मूरत रचकर, धरती पर तुमको उतारा। ममता के आँचल से ढककर , द्वार पर बैठाया पहरेदार बनाकर, बोली "कोई न आए अंदर , जब तक न हो स्नान पूर्ण। तभी पिता शिव लौटे कैलाश से, देखा बालक द्वार खड़ा, मार्ग रोका उसने दृढ़ होकर, बोला "माता का है यह वचन बड़ा। शिव का क्रोध प्रचंड हुआ, त्रिशूल उठा गर्जन हुआ, धरती हिली, गगन मौन हुआ , बालक का शीश कटकर गिरा धरा पर। माँ विलाप कर उठीं देखकर, अश्रुधार बहती गई, करुण पुकार से त्रिलोक डोला, हर दिशा दु:ख में डूब गई। देव-दनुज सब आ जुटे सभी, विनती करने लगे महादेव से, माँ की पीड़ा शांति करें, जीवन लौटा दें उस बालक में। तब शिव ने करुणा दिखाई, विष्णु गरुड़ पर चढ़ तभी आए, हाथी का मस्तक संग लाए, उस बालक के धड पर रखा। श्वास पुनः अंगों में भरा, जीवन का संचार हुआ, सबने देखा अद्भुत बालक, गणनायक अवतार हुआ। शिव ने वरदान दिया सर्वप्रथम पूज्य कहलाओगे, हर शुभ कार्य में, तुम्हारा नाम ही जग गाएगा। माता ने आँचल फैलाकर, तुम्हें गले लगाया प्रेम से, तब से विघ्नहर्ता विनायक, पूजित हो जन-जन के हृदय से।
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