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मैं उम्र के उस पड़ाव में हूं..... जहां सिर्फ अकेला रहना अच्छा लगता है। इस दुनिया से मोह खत्म हो गया खुद में इतना डूब रही हूं अब बस मन रूपी समंदर के गर्त में अंधेरा नजर आ रहा है ना मैं किसी की आदत बन पाई ना ही कोई मेरे बिना रह सका मैं बस अकेली रह गई। ✍️ अंतिमा 😊
बहोत अजीब लड़की हूं मैं अकेली रहती हु तो जिंदगी फीकी लगने लग जाती है लोगो के साथ रहू तो सिर दर्द होने लग जाता है खुश रहने की कोशिश करूँ तो future याद आ जाता है मायूस रहने लग जाऊं तो जिंदगी जीने की ख्वाईश होती है मैं खुद बात नहीं कर पाती... और लोगों की बातों से irritate हो जाती हूं। मैं तो कुछ नहीं सहती बोलकर सब सह लेती हूं। मीठा खा कर तीखा खाने की आती है तो तीखा खा कर मीठा खाने का मन करता है कभी छोटी बात पर भी खुल कर हँस देती हूं तो कभी बिना वजह रोने लग जाती हूं। दिल से नर्म इतनी दूसरों के दुख को अपना मान लेती हूं तो कभी जरूरत पड़ने पर अपनों के लिए पत्थर भी बन जाती हूं। बाहर घूमने का दिल करता है लेकिन घर से बाहर निकला नहीं जाता। पता नहीं मैं किसी लड़की हूं। ✍️ अंतिमा 😊
मैं खुद पर संदेह करके खुद को कमजोर कर रही हूँ जबकि लोग मेरी क्षमता से डरे हुए है मैं कलयुग की द्रोपति हु लाज बचाने किसी कृष्ण को नहीं बुलाऊंगी ✍️ अंतिमा 😊
कितना आसान है कहना " कोई बात नहीं अगली बार मेहनत करना"। हा मैं मानती हु मेहनत मैं फिर से कर लूंगी। लेकिन पहले जैसे आत्मविश्वास कहा से ला पाऊंगी खुद से नजरे कैसे मिला पाऊँगी घरवालो को कैसे बता पाऊंगी उनकी बेटी असफल हो गई। तुम सोचो मुझ पर क्या गुजर रही है मैं कैसा महसूस कर रही हु भविष्य में चारों तरफ बस अंधकार दिख रहा है। कई मैं काजल की कोठरी में तो नहीं आ गई मेरे कान्हा ने कहा बस मेहनत करो मेरा प्रश्न है कान्हा तुमसे क्या कमी रह गई थी मेरी मेहनत मे क्या मैं सफल होने लायक नहीं थी। दिल के हजार टुकड़े को कैसे समेट पाऊंगी। तुम नहीं आए माधव अपनी सखी की लाज बचाने मैं खुद से शिकायत कर रही हु क्यों किया मैंने तुम पर भरोसा। मैं अपनी प्रार्थनाओं को वापस लेती हु और तुम्हे धन्यवाद देती हु। मुझे फिर से याद दिलाने के लिए कोई भरोसे के लायक नहीं होता। अब बस मुझे खुद हिम्मत करके लोगो का सामना करना होगा। ✍️ अंतिमा 😊
मैं भी गलत आदतों की शिकार हुईं हूं मैने भी जुआ खेला है अपनी जिंदगी का सरकारी मैडम बनने के लिए अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी। युधिष्ठिर के समान एक के बाद एक बाजी हारती गई पहला दाँव मेरे बचपने पर लगा परिपक्वता इतना जल्दी आई कि मैं ये दाँव हार गई। दाँव मेरे चरित्र पर लगा असफलता ने उसको ओर उजागर कर दिया ये दाँव भी में हार गई। दाँव मेरी खुशियों पर लगा ओर मुझे इस बाजी पर भी हार का सामना करना पड़ा। दाँव मेरी जवानी पर लगा किताबों में भटके हुए वो भी निकल गई और में हार गई। अन्ततः दाँव मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व पर लगाया गया जब विपक्ष में अपने ही खेल रहे हो तो ये बाजी भी मैं कैसे जीत सकती हूं। अब बस भरी सभा में मेरी अपमानित होने की बारी आ गई। मुझे पूरा विश्वास है मेरी लाज बचाने कृष्ण जरूर जायेंगे।। ✍️ अंतिमा 😊
बचपन में जहां 1 महीने पहले जन्मदिन मनाने का उतावलापन रहता था। परिपक्व होने पर 365 दिनों में सबसे महनूस दिन भी वही लगता है ।। ✍️ अंतिमा 😊
मैं किसी high cafe में जाना चाहती हूं। 2 कप cold coffee के order करना चाहती हु एक अपने लिए....... ओर दूसरा भी अपने ही लिए ..... बाकी आपने जो सोचा वो भी ठीक था। ✍️ अंतिमा 😊
अक्सर चाय lover कॉफी date पर जाया करते है ✍️ अंतिमा 😊
पहली बार पत्थर की मूर्ति पर भरोसा कर रही हूं मेरा भरोसा टूटने मत देना माधव। इतना टूट चुकी हूं तुम्हारी बनाई सृष्टि के जीवो पर विश्वास नहीं होता मुझ पर अनेक उंगलियां उठ चुकी है उनका जवाब मुझे अपने परिणाम से देना है अब बात मेरे चरित्र पर आ गई है गोविंद एक कागज का टुकड़ा मेरा भविष्य निर्धारित करेगा ✍️ अंतिमा 😊
अगर मैं सफल नहीं हुई तो..... अपनी स्ट्रगल की कहानी कैसे बताऊँगी। अंगुलियों पर पेन के निशान, आँखो के काले घेरे कैसे दिखा पाऊंगी। कैसे यकीन दिला पाऊंगी मैने भी बहुत मेहनत की असफल लड़की का स्ट्रगल सुनना कौन चाहेगा। लोगो की नजरों में महान कैसे बन पाऊंगी ✍️ अंतिमा 😊
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