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ARTI MEENA

ARTI MEENA

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क्या मुझे भी मिलेगी वो दुनिया
अब मैं भी बढ़ना चाहती हूँ उस दिशा में,
जहाँ अस्तित्व को लिंग से नहीं,
मानवता से पहचाना जाए।
जहाँ पहचान का पहला अक्षर — इंसान हो।
क्या मुझे भी मिलेगी वो दुनिया,
जहाँ मेरी आवाज़ पर पहरे न हों,
जहाँ मेरे शब्दों को
मेरे होने से कम न आँका जाए।
क्या वहाँ कोई ठहराएगा मुझे
इन सीमाओं के अदृश्य घेरों में?
क्या कोई पूछेगा मुझसे —
क्यों तोड़ी तुमने परंपराओं की जंजीरें?
क्यों लांघी तुमने
उस चौखट की चुप दीवारें,
जिसे सदियों से
औरत की सीमा कहा गया?
क्या वहाँ कोई रोकेगा मुझे
मेरी उड़ान की दहलीज़ पर?
या खुलेगा मेरे सामने
संभावनाओं का अनंत आकाश —
जहाँ मैं बन सकूँ
अपनी ही परिभाषा।
मैं औरत हूँ —
पर उससे पहले मैं चेतना हूँ,
मैं स्वप्न हूँ,
मैं संघर्ष की वह अग्नि हूँ
जो राख से भी जन्म लेती है।

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औरतों ने सहा बहुत,
पर कहा कभी किसी से नहीं।
अपना घर छोड़कर,
दूसरे घर को अपना बनाया।
जिस घर को दिल से सजाया,
वहीं एक दिन पूछ लिया गया —
“तेरा है क्या यहाँ?”
मुस्कुराकर हर रिश्ता निभाया,
अपने दर्द को चुपचाप छुपाया।
सबकी खुशियों में खुद को भूल गई,
पर अपनी खुशी कभी खुलकर जी नहीं पाई।
सुबह से रात तक जिम्मेदारियों में ढली,
कभी बेटी, कभी बहन, कभी पत्नी बन चली।
हर रूप में खुद को बाँटती रही,
पर अपने हिस्से की पहचान ढूँढती रही।
फिर भी हर टूटन के बाद संभलती है,
हर आँसू के बाद फिर चलती है।
औरत सिर्फ सहती ही नहीं,
वो हर हाल में जिंदगी गढ़ती है।

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कभी पूछो अपनी माँ, बहन, पत्नी, बेटी से,
क्या आज चलें दो पल साथ घूमने?
क्या आज करें दो पल अपने मन की बातें?
क्या आज दो पल के लिए
एक-दूसरे के आँसू पोंछ लें?
क्या दो पल उन्हें बस इंसान रहने दें?
कभी पूछो उनसे,
क्या उनके भी कुछ सपने अधूरे हैं?
क्या वो भी कभी थक जाती हैं?
क्या वो भी कभी बिना वजह हँसना चाहती हैं?
जिन्होंने तुम्हारी हर खुशी में
अपनी खुशियाँ जोड़ दीं,
क्या तुमने कभी सोचा
उनकी खुशी किसमें है?
दो पल अगर तुम साथ बैठ जाओ,
तो शायद वो सब कह पाएँ
जो सालों से दिल में छुपाए बैठी हैं।
क्योंकि वो मजबूत जरूर हैं,
पर पत्थर नहीं,
वो मुस्कुराती जरूर हैं,
पर बेपरवाह नहीं —
वो सबसे पहले
एक इंसान हैं।

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कला में चेहरों की सुंदरता नहीं,
आत्मा की छाप मायने रखती है।
कला वो है
जो हाथों की रेखाओं से निकलकर
समय पर अपनी कहानी लिखती है।
कला वो है
जो नयनों की खामोशी में छिपकर
अनकहे भावों को जन्म देती है।
कला वो है
जो चलती हुई हवा बनकर
रूह को छू जाती है
बिना दिखाई दिए।
कला को किसी माप,
किसी सीमा,
किसी परिभाषा में कैद नहीं किया जा सकता,
क्योंकि एक समय के बाद
ज़िंदगी खुद
कला की सबसे गहरी अभिव्यक्ति बन जाती है। ....ARTI MEENA

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