पुरानी इमारत
लेखक: विजय शर्मा एरी
शहर के किनारे, जहाँ नई इमारतें आसमान छूने की होड़ में थीं, एक पुरानी इमारत खड़ी थी। तीन मंज़िला, पीली दीवारें जिन पर समय की परतों ने काला धब्बा जमा दिया था, टूटी खिड़कियाँ, और छत पर उगी घास। लोग उसे “भूतिया महल” कहते थे। कोई पास से गुज़रता तो सर झुका लेता, बच्चे खेलते-खेलते अचानक चुप हो जाते। कहते थे रात को वहाँ रोशनी जलती है, सीढ़ियों पर कदमों की आहट आती है, और कभी-कभी कोई औरत रोती सुनाई देती है।
मैं अरुण था। तीस साल का, शहर में नौकरी करता, अकेला रहता। माँ-बाप गाँव में थे। एक दिन दफ़्तर से लौटते समय उस पुरानी इमारत के सामने ठहर गया। हवा में पुरानी लकड़ी और धूल की गंध थी। दिल में अजीब खिंचाव हुआ। शायद बचपन की कोई याद। या सिर्फ़ जिज्ञासा।
अगले दिन मैंने मालिक से बात की। इमारत किसी बुज़ुर्ग की थी, नाम था हरिप्रसाद शर्मा। वे सालों पहले शहर छोड़कर चले गए थे। किराए पर देने को तैयार थे, सस्ता। मैंने मना नहीं किया। उसी हफ़्ते सामान बाँधकर उस इमारत की दूसरी मंज़िल पर पहुँच गया।
पहली रात नींद नहीं आई। दीवारें बोलती लगती थीं। हवा खिड़की से घुसकर पर्दे हिलाती, सीढ़ियों पर कभी-कभी खड़खड़ाहट होती। मैंने खुद को समझाया—पुरानी इमारत है, लकड़ी सिकुड़ती है, चूहे होंगे। पर मन नहीं माना।
सुबह उठकर पूरी इमारत घूमा। नीचे की मंज़िल खाली थी, ऊपर अटारी में पुराने सामान पड़े थे—टूटे फ़र्नीचर, जंग लगे ताले, धूल भरी तस्वीरें। एक कमरे में लकड़ी का बड़ा संदूक मिला। ताला टूटा हुआ था। अंदर पुरानी डायरियाँ, पत्र और कुछ फ़ोटो। मैंने एक डायरी उठाई। पन्ने पीले, स्याही फीकी। लिखा था—
“आज फिर वही सपना आया। इमारत जल रही है, और मैं अंदर बंद हूँ। माँ पुकार रही है, पर आवाज़ नहीं निकलती…”
डायरी के लेखक का नाम था—“कमल”। तारीख बीस साल पुरानी।
मैं रोज़ थोड़ी-थोड़ी पढ़ने लगा। कमल इस इमारत में पैदा हुआ था। उसके पिता हरिप्रसाद एक अमीर व्यापारी थे। माँ सरला बहुत सुंदर और संवेदनशील। परिवार खुश था, पर धीरे-धीरे कुछ टूटने लगा। पिता व्यापार में उलझ गए, माँ अकेली पड़ गई। कमल लिखता—
“माँ रात-रात भर छत पर बैठी रहती हैं। कहते हैं वे किसी की राह देखती हैं। पिता कहते हैं पागल हो गई है। मैं डरता हूँ।”
एक रात मुझे खुद सपना आया। मैं उसी इमारत में था, आग लग रही थी, कोई चीख रहा था। सुबह पसीने से लथपथ उठा। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
मैंने पड़ोस के बुज़ुर्ग से पूछा। उन्होंने बताया—“बहुत साल पहले यहाँ आग लगी थी। हरिप्रसाद की पत्नी अंदर फँस गईं। बेटा कमल बाहर था। माँ जलकर मर गईं। उसके बाद पिता-पुत्र दोनों शहर छोड़कर चले गए। कहते हैं कमल पागल हो गया था।”
डायरियाँ आगे पढ़ीं। कमल लिख रहा था कि आग दुर्घटना नहीं थी। पिता पर कर्ज़ था, बीमा का पैसा चाहिए था। माँ को अंदर बंद करके आग लगाई गई। कमल ने सब देख लिया था, पर बोल नहीं पाया। डर से, या शर्म से।
“मैंने माँ को चीखते सुना। दरवाज़ा बाहर से बंद था। मैं भागकर पहुँचा, पर देर हो चुकी थी। पिता ने कहा—‘बेटा, ये दुर्घटना थी।’ मैंने कभी मुँह नहीं खोला।”
मेरे हाथ काँप गए। क्या ये सच था? या एक टूटे हुए मन की कल्पना?
मैंने हरिप्रसाद से संपर्क करने की कोशिश की। पता चला वे गाँव में रहते हैं, बहुत बीमार। कमल के बारे में कोई खबर नहीं। कुछ कहते थे वह विदेश चला गया, कुछ कहते थे वह भी मर गया।
एक रात बहुत तेज़ आंधी आई। बिजली गुल हो गई। मैं मोमबत्ती जलाकर बैठा था। अचानक ऊपर की अटारी से आहट आई। जैसे कोई चल रहा हो। मैंने हिम्मत करके ऊपर गया। अटारी का दरवाज़ा अधखुला था। अंदर अंधेरा। मोमबत्ती की रोशनी में देखा—संदूक खुला पड़ा था, और एक पुरानी साड़ी ज़मीन पर बिखरी हुई। साड़ी पर जले हुए निशान।
मैंने साड़ी उठाई। अंदर एक छोटा सा लocket था। खोलकर देखा—एक स्त्री की तस्वीर, सरला। पीछे लिखा—“मेरे बेटे कमल के लिए। माँ हमेशा साथ है।”
उस रात मैं सो नहीं पाया। सुबह उठते ही मैंने फैसला किया—इस रहस्य को सुलझाना है।
मैं गाँव गया। हरिप्रसाद बहुत कमज़ोर थे। बिस्तर पर लेटे, आँखें धँसी हुई। मैंने अपना परिचय दिया। बताया कि उनकी पुरानी इमारत में रहता हूँ। उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
“वो इमारत… छोड़ दो बेटा। वहाँ सिर्फ़ दर्द है।”
मैंने डायरियों का ज़िक्र किया। कमल की बात कही। हरिप्रसाद की आँखों से आँसू बह निकले।
“मैंने गलती की थी। कर्ज़ के बोझ में… बीमा का लालच… मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया था। कमल ने देख लिया। उसने कभी माफ़ नहीं किया। एक दिन गायब हो गया। सालों बाद एक पत्र आया—‘पापा, माँ की आत्मा अभी भी उस इमारत में है। मैं लौटूँगा जब सच्चाई सामने आएगी।’”
हरिप्रसाद ने काँपते हाथ से एक पता दिया। कमल दिल्ली में किसी पुराने इलाके में रहता था, नाम बदलकर।
मैं दिल्ली पहुँचा। लंबे समय की खोज के बाद एक छोटे से कमरे में कमल मिला। पचास के करीब, बाल सफ़ेद, आँखों में वही पुरानी इमारत का अक्स।
उसने मुझे देखा और पहचान लिया जैसे। “तुम उस इमारत से आए हो?”
मैंने सब बताया। डायरियाँ, साड़ी, लocket। कमल रो पड़ा।
“मैंने माँ को नहीं बचाया। डर के मारे चुप रहा। सालों तक भागता रहा। पर माँ की आवाज़ हमेशा सुनाई देती रही। अब मैं लौटना चाहता हूँ। सच्चाई कहनी है।”
हम दोनों शहर वापस आए। हरिप्रसाद को अस्पताल में भर्ती कराया। कमल ने पिता से माफ़ी माँगी, और पिता ने बेटे से। दोनों रोए। फिर कमल ने पुलिस और अख़बार को सच्चाई बताई। बीमा का मामला पुराना था, पर आत्मा को शांति मिली।
कुछ महीने बाद हरिप्रसाद चल बसे। कमल ने इमारत को बेचने के बजाय मरम्मत करवाई। दीवारें दोबारा पुतीं, खिड़कियाँ लगनीं, छत ठीक हुई। अब वहाँ कोई भूत नहीं रहता था। कमल ने नीचे की मंज़िल पर एक छोटी लाइब्रेरी बनाई—पुरानी किताबें, डायरियाँ और यादें रखने के लिए। ऊपर वह खुद रहने लगा।
एक दिन मैं उससे मिला। वह मुस्कुरा रहा था।
“अरुण, पुरानी इमारतें सिर्फ़ ईंट-पत्थर नहीं होतीं। वे हमारी गलतियों, पछतावों और प्रेम को संजोए रखती हैं। जब हम सच का सामना कर लेते हैं, तो दीवारें भी हल्की हो जाती हैं।”
मैंने इमारत को अंतिम बार देखा। सूरज की रोशनी खिड़कियों से अंदर घुस रही थी। हवा में अब धूल नहीं, नई शुरुआत की खुशबू थी।
मैं वहाँ से चला आया, पर दिल में एक बात बस गई—
कुछ इमारतें गिर जाती हैं समय के साथ।
कुछ इमारतें खड़ी रहती हैं, क्योंकि उनमें बसी यादें और सच्चाइयाँ उन्हें थामे रहती हैं।
और कुछ इमारतें तब जीवित हो उठती हैं, जब कोई उनमें दबे दर्द को प्यार से छू लेता है।
पुरानी इमारत अब पुरानी नहीं रही। वह एक नई कहानी का घर बन गई थी—माफ़ी, सच्चाई और प्रेम की।
(शब्द संख्या लगभग 2000)
— विजय शर्मा एरी