Kighkanya - 7 in Hindi Mythological Stories by Shree Kriti books and stories PDF | किघकन्या - 7

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किघकन्या - 7

कुछ दिन पहले सहसा मृत्यु ने इस कहानी की सबसे निर्मल, सबसे भोली और सबसे सुकुमार पात्र ' रोहिणी ' को निगल लिया था और फिर उसकी विक्षुब्ध आत्मा प्रतिशोध के लिए हुंकार उठी थी, फिर शुरू हुआ मौत का तांडव पर विनाश का एक चक्र जैसे अब पूरा हो चुका था। लेकिन गाँव वाले अब तक उस भय से थर्राये हुए थे इसलिए तो जब बाबा बटेश्वर आये तो पूरा गाँव उनके शरण में आने के लिए उमड़ पड़ा। 
बाबा आकर पुराने बरगद के पेड़ के नीचे आसन जमा कर बैठ गए ... पूरा शरीर भस्म से रमा हुआ ... लाल गुलाल आॉंखें ... चेहरे पर ऐसा अद्भुत तेज की श्रद्धा स्वत: उत्पन्न हो जाये। सब सुन सकें इतने ऊँचे स्वर में बाबा बटेश्वर बोले, 
" वह कोई साधारण प्रेतात्मा नहीं है। उसे वश में करना असंभव है। "

गाँव वालों के बीच हाहाकार मच गया ... औरतें विलाप करने लगीं ... कितने ही गाँव वाले बाबा बटेश्वर के चरणों में लोटने लगे। हर स्थिति में धैर्य रखने वाले पुजारी जी भी विचलित हो कर बोले, 

" इन गाँव वालों को आपका ही आसरा है बाबा, कुछ तो उपाय होगा ... भला आपके लिए क्या असंभव है? "

" ना पंडित ! हमारी भी सीमाएँ हैं, असीमित तो सिर्फ महाकाली हैं। वो प्रेतात्मा डाकिनी, शाकिनी, पिशाचिनी किसी भी प्रेत योनि मे होती, मैं उसे अपनी मुठ्ठी में कैद करके इस गाँव को मुक्ति दिला सकता था परन्तु वह किचकन्या बन चुकी है उसे वश में करना अब संभव नहीं। "

किचकन्या जैसी कोई प्रेतात्मा होती है इस बात से गाँव वाले ही नहीं पुजारी जी भी निरा अनजान थे, उन्होंने अकचका के पूछा, 

" किचकन्या ? किचकन्या क्या होती है बाबा ?? "

" यह उन युवा महिलाओं की प्रेतात्मा होती है जिनके साथ उनके जीवन में बहुत अत्याचार हुआ हो और जिन की मृत्यु गर्भावस्था या प्रसव के दौरान भयावह रुप से हो गई हो। ये एकांतवासी प्रेतात्मा अपने मृत शरीर के किसी ऐसे हिस्से से चिपकी रहतीं हैं जिसका अंतिम संस्कार न हुआ हो, आमतौर पर कोई हड्डीदार अंग। इसकी शक्ति उसी अंग में समाहित होती है। "

पुजारी जी ने अचरज भरी नेत्रों से तांत्रिक बाबा को देखते हुए बोले, 
" आपने जो कहा, वह छोटी ठकुराइन के जीवन का कटु सत्य है ! परन्तु बाबा मैंने स्वयं गाँव वालों के द्वारा छोटी ठकुराइन का अंतिम संस्कार विधिवत करवाया था। फिर यह कैसे संभव है कि उनके किसी अंग का अंतिम संस्कार न हुआ हो ?  "

सब सोच में पड़ गए ... अचानक से एक औरत बोल उठी, 
" हाथ ... बाबा जी ! हाथ ... जब छोटी ठकुराइन के लाश जंगल से गाँव में इहाँ आए रहे, उनकर एक हाथ नाहीं था। "

अब क‌ई लोगों को यह बात याद आ गई, उन्होंने तत्काल इस बात की पुष्टि की। इस बार सरपंच जी ने हाथ जोड़कर पूछा, 
" मगर बाबा किचकन्या को वश में क्यों नहीं किया जा सकता ? क्या किचकन्या इतनी शक्तिशाली होती है? "

" मैंने आरंभ में ही कहा था कि ये साधारण प्रेतात्मा नहीं होतीं। यह प्रेतात्मा पुरषों से असीम घृणा करती है क्योंकि अपने जीवन काल में यह उन्हीं के द्वारा सतायी ग‌ईं होतीं हैं। अपनी घृणा से वशीभूत ही यह किसी को साधारण मौत नहीं देतीं बल्कि उनके शरीर से सारी जीवन शक्ति चुस लेती है और उन्हें तड़प - तड़प के मरने पे विवश कर देतीं हैं। इसे वश में करना इसलिए भी असंभव है क्योंकि यह किसी नश्वर शरीर में प्रवेश नहीं करतीं ... अंतिम संस्कार से बच गए अंग से वो एक बार अपने आखेट को स्पर्श कर लेती है फिर उसका बचना असंभव होता है। "

पुजारी जी निराश स्वर में बोले, 
" यानि गाँव की सुरक्षा असंभव है ! "

" मैंने ऐसा तो नहीं कहा पंडित ! किचकन्या को वश में करना संभव नहीं पर गाँव वालों की रक्षा का एक उपाय है।"

क‌ई स्वर एक साथ उत्सुकता से गूंज उठे, 
" क्या ... क्या ... क्या ........... !!! "

" हाँ ! किचकन्या उसी स्थान पर भटकती रहती है जहाँ उसकी मृत्यु होती है, मैं उस स्थान को तंत्र - मंत्र द्वारा बांध दूंगा परन्तु तुम सभी को सर्तकता बरतनी होगी। अंधेरा होने के बाद जंगल की ओर जाना वर्जित होगा ... विशेष रूप से पुरुष, अगर स्वंय को भयंकर मौत से बचाना चाहते हैं। साथ ही जमींदार के दोनों हवेलियों को भी भैरव कवच चढ़ाकर बन्द करना होगा, वो हवेलियाँ भी प्रेतवाधित हो चुकीं हैं। "

फिर एक साथ क‌ई लोगों की सिसकारियाॅं गूंजी, 
" अरे माई रे .......... देवी माई ... शिवशम्भू !!! "

इसके बाद पन्द्रह दिन तक लागातार हवन - पूजन - यज्ञ के बाद तंत्र - मंत्र द्वारा माँ बगलामुखी कवच से जंगल के सीमा को बांध दिया बाबा बटेश्वर ने, साथ ही दोनों हवेलियों को भैरव कवच चढ़ाकर बन्द करवा दिया। और इस तरह से शिवनगर वालों ने बाबा बटेश्वर की कृपा से राहत की सांस ली। लेकिन आखिरी दिन एक विचित्र घटना घटी। हुआ यूँ कि आखिरी दिन बाबा बटेश्वर की नज़र गेरुआ कपड़े में लिपटी जामून के पेड़ का ओट लेकर खड़ी घुॅंघरू पर पड़ ग‌ई ... अपनी शक्तियों द्वारा जैसे उन्होंने सब जान लिया । 

वो घुॅंघरू को कठोर नजरों से देखते हुए प्रचण्ड स्वर में बोले, 
" विश्वासघातिनी ! तू ही है ना वो जिसने ठाकुर के लिए यम का दरवाजा खटखटाया ...... किचकन्या की साथिन यहाँ आ ! "

गाँव के कुछ लोग आक्रोशित होकर उसे पकड़ने के लिए बढ़े लेकिन अचरज की बात थी कि यह देख कर भी घुॅंघरू जरा भी नहीं डरी बल्कि धीरे - धीरे पीछे की ओर खिसकने लगी। फिर घुमी और जान लगाकर भागी, पलक झपकते ही जंगल की सीमा को लांघ ग‌ई। जो लोग उसे पकड़ने के लिए बढ़े थे, उसे जंगल में घुसता देख भय से जहाँ के तहाँ खड़े रह गए ... किसी की हिम्मत ही नहीं हुई आगे बढ़ने की। 
इस घटना के बाद घुॅंघरू कभी नहीं दिखाई दी .............. 
पर जितने मुंह उतनी अफवाहें, कोई कहता कि वो किचकन्या की गुलाम बन ग‌ई है तो कोई कहता कि घुॅंघरू मर चुकी है, एक भयंकर चुड़ैल बन ग‌ई है और उस जामुन के पेड़ पर ही उलटा लटकी रहती है .......... 


इन घटनाओं की चर्चा पीढ़ी दर पीढ़ी चलतीं रहीं वहाँ ...  कुछ भुला दीं ग‌ईं .... कुछ बदल दीं ग‌ईं ... लोककथा बन ग‌ई पर अब भी साॅंझ ढलने के बाद उस राह पर कोई नहीं जाता। अगर कोई भूला - भटका उस जंगल की ओर चला जाता है तो उसे ऐसी परम सुन्दरी दिखती है जो लाल दुल्हन का जोड़ा पहने होती है। वह उन्हें लुभाती है, उसकी खुबसूरत आॅंखों में देखते ही वह पुरुष उसके आधीन हो जाता है और वह उसे मात्र एक बार हाथों से स्पर्श कर के विलुप्त हो जाती है फिर वह पुरुष ऐसे तड़प - तड़प के मरता है कि देखने वालों की आत्मा काॅंप उठती है। लोग कहतें हैं यह वही है  '  किचकन्या  '   ......................... 


(  किचकन्या का वर्णन कुछ पौराणिक कथाओं में भी मिलता है लेकिन मेरी यह कहानी नेपाली लोककथा से प्रेरित है। लोककथाएँ विस्तृत नहीं होतीं इसलिए मैंने इस कहानी में अनेकों बदलाव किए हैं, जैसे किरदारों के नाम क्योंकि लोककथाओं में आमतौर पर किरदारों का नाम नहीं होता इसलिए इन किरदारों को नाम मैंने दिया है। कहानी को विस्तार से प्रस्तुत करने के लिए क‌ई किरदार मैंने स्वयं निर्मित किये जैसे कि बड़ी ठकुराइन, मुंशी शुब्बा लाल, पुजारी जी, तांत्रिक बाबा, रोहिणी के चाचा - चाची, सरपंच, केशव प्रसाद और मेरी प्रिय घुॅंघरू। खासतौर पर मैं बताना चाहूँगी कि यह लोककथा बस जमींदार की पत्नी के मरने और किचकन्या बनने तक ही है, किचकन्या के प्रतिशोध की कहानी मेरे कल्पना शक्ति द्वारा रचित है। 
मुझे आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि प्रस्तुत कहानी आपके लिए रोमांचक और दिलचस्प सिद्ध होगी।  ) 


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समाप्त  

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