Kighkanya - 5 in Hindi Mythological Stories by Shree Kriti books and stories PDF | किघकन्या - 5

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किघकन्या - 5

कुछ दिनों में ही वीर सिंह का हाल भयावह हो गया था ... आॅंखें खुन सरीखी लाल ... कांपती देह  ... आवाज धीमी, ऐसी मानों कोई फुसफुसा रहा हो मगर सांसों का स्वर बेहद तीव्र ... संपूर्ण शरीर में दर्द की लहर सी दौड़ती रहती थी  ... अन्न खाया नहीं जाता था, जो कुछ जबरदस्ती खाता वो भी कै हो जाता था  ... शरीर धीरे - धीरे कमजोर हो कर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था, जैसे कोई उसके शरीर का शक्ति चूस रहा हो ... वीर सिंह की जीवन शक्ति खत्म होती जा रही थी .................. 

बड़ी ठकुराइन  समझ चुकीं थीं कि वैद्यॊं के किये कुछ नहीं होने वाला। उन्होंने स्वयं गाँव के मंदिर जा कर पुजारी जी को हवेली आने का ससम्मान आमंत्रण दिया।  पुजारी जी जब हवेली आये तो बड़ी ठकुराइन ने उचित आसन देकर सम्मान से उन्हें बैठाया। 

" मैं आप के कहे बिना भी समझ गया हूँ कि आप क्या कहना चाहती हैं ठकुराइन। "

रानियों की तरह राजसी तौर- तरीके से रहने वाली बड़ी ठकुराइन यानि गंगा देवी इस वक़्त घूंघट से लगभग अपना आधा मुंह ढंक के वहीं जमीन पर सिकुड़ के बैठीं थीं, पंडित जी की बात सुनकर वो बिलख के रोने लगीं और बोलीं, 
" कछु उपाय किजिए पुजारी जी, मेरे बच्चा का प्राण बचाइए। "

पुजारी जी नाराजगी से सिर हिलाते हुए बोले, 
" मैंने तब ही कहा था कि छोटी ठकुराइन का अंतिम संस्कार अच्छे से उनके स्वामी के हाथों से होना चाहिए पर ठाकुर साहब ने तब एक न सुनी। अब जब सांप निकल गया तो लकीर पीटने से का फायदा । "

बड़ी ठकुराइन ने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा के फरियाद की, 
" ऐसा ना बोलिए, आप ही का सहारा है पुजारी जी ! कछु तो उपाय होगा राहत का ? "

तभी वीर सिंह के जोर- जोर से चिल्लाने का स्वर सुन कर बड़ी ठकुराइन उठीं और भागकर उधर की ओर जाने लगीं, उनके पीछे पुजारी जी भी चल दिए। वहाँ उन्होंने वीर सिंह का जो हाल देखा, वो हौलनाक था .... वीर सिंह कराह रहा था .... जल बिन मछली की तरह छटपटा रहा था और चिल्ला रहा था कि उसके बदन में आग लगी हुई है, वो जल रहा है ... उसने अपने कपड़े फाड़कर फेंक दिए थे, वो लगभग नग्न अवस्था में था और सच में देखने से ऐसा लग रहा था कि उसके बदन में अंगारे भरें हों ... पूरे बदन पर जलने के निशान थे ... फफोले पड़ गए थे और अजीब सी तीव्र दुर्गंध आ रही थी उस से ...................................... 
वैद्य तरह - तरह के लेप की मालिश कर रहे थे बदन पर लेकिन कुछ खास असर होता नहीं दीख रहा था।  पुजारी जी को और कुछ न सुझा तो वह बजरंग बाण का पाठ करने लगे, साथ ही अपनी पोटली से घिसा हुआ चंदन निकाल कर वीर सिंह के ललाट पर लगा दिया और हाथ में हनुमान जी के चरणों में चढ़ाया हुआ मौली बांध दिया। वीर सिंह तत्काल शांत हो गया मगर अगले ही क्षण बेहोश हो गया पर इसके बावजूद बड़ी ठकुराइन ने राहत भरी सांस ली और रोती हुई पुजारी जी के चरणों में पड़ गई। 

" उठिए ठकुराइन, उठिए ! यह तो अल्पकालिक उपाय है, अगर अपने पुत्र को बचाना है तो आपको कठिन प्रयास करना होगा हालांकि आपके पुत्र ने अपने लक्षण और करमों के कारण ही यह गति पाई है परन्तु फिर भी मैं उनके रक्षा का प्रयास करूँगा, आगे शिवशम्भू की मर्जी। "

" आप बस आदेश दे दिजिए। "

" आदेश ... नहीं ... नहीं ... सुनिए ठकुराइन ! परसों सोमवार है, परसों तक कुछ साम्रगियों की व्यवस्था आपको हवेली में करवानी होगी। परसों हवेली में दशांश हवन करना होगा और फिर भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने के बाद सवा किलो अश्वगंधा उन्हें अर्पित करनी होगी ... सांप का जोड़ा भी भगवान शिव को अर्पण करना होगा। परसों यह हवन - पुजन हो जाने के बाद धर्मी तिथि देख कर महामृत्युंजय अनुष्ठान करना होगा, उस अनुष्ठान के सम्पूर्ण हो जाने के बाद फिर उपयुक्त तिथि पर गरूड़ पुराण का भी अनुष्ठान आवश्यक है और भगवान विष्णु की अर्चना करनी होगी ... फिर देवों - पितरों से ठाकुर साहब के लिए प्रार्थना करनी होगी कि वह उन्हें प्रेत बाधा से मुक्ति दें । "

" मैं सब तैयारी रखूँगी, आप सारे अनुष्ठान किजिए ल..ल..ले..लेकिन पुजारी जी, यह सब तो परसों से शुरू होगा, तब तक लड़के की रक्षा क‌इसे होगी। अ... अ... आ... आप... ‌आपने तो देखा न उसका प्रकोप........ । "

" हूंहह ! आप के पुत्र द्वारा सतायी हुई आत्मा है ... असमय हत्या हुई थी उसकी इसलिए इतनी उग्र है ... प्रतिशोध चाहती है ।  मैं मंदिर जा कर माँ आदिशक्ति को चढ़ाया हुआ पवित्र चुनरी भिजवा दूंगा, कइसे भी कर के उनके माथे पर बांध दिजीयेगा और ध्यान से सुनिए रात के घड़ी, भोजन के पश्चात देवता के घर में चांदी के कटोरे में कपूर और लौंग का जला लिजियेगा फिर जब धूंआ उठने लगे तो ठाकुर साहब के कोठरी में लाकर हर कोने में वह धूंआ फैला दिजियेगा और सावधान, बेटा के मोह में पड़ के उस कोठरी में रात के वक़्त हरगिज़ नहीं ठहरना है !! "

बड़ी ठकुराइन वापस साष्टांग पुजारी जी के चरणों में पड़ गईं  ... डूबते को तिनके का सहारा ............... 
पुजारी जी तो बड़ी ठकुराइन को आर्शीवाद देते हुए हवेली से निकल कर मन्दिर की ओर बढ़ गए। 

लेकिन कोई साया था जो किवाड़ के आड़ में छुपा उनकी बातें सुन रहा था, वह आॅंखें घिन से भरीं थीं। उतने ही गहरे नफ़रत से भरा स्वर उभरा, 
" रे ... रे ... रे ठकुराइन ! न ... ना यह तो होने वाला न है ... ठाकुर को अपने करम का भुगतान तो करना होगा ... इता गन्दा आदमी और जी के करेगा का ? पुजारी जी के चरणों में लोटो या चाहे कौनो उपाय करो ठकुराइन,भगवान भी उस जइसन पापी के रक्षा नाही करेंगे ... देख लेना ... छोटी ठकुराइन के वास्ते रस्ता तो हम खोल ही देगें ... तड़प - तड़प के मरेगा ठाकुर, बस देखत रहो । "


क्रमशः ...................