Kighkanya - 4 in Hindi Mythological Stories by Shree Kriti books and stories PDF | किघकन्या - 4

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किघकन्या - 4

कुछ दिन बाद कुछ लकड़हारे उसी घाटी में लकड़ियाँ काटने गए। वहाँ उनकी नजर जमीन से निकले हुए हाथ पर ग‌ई, हाथ में हड्डियां थीं ... मांस लगभग गल चुका था । यह खौफनाक दृश्य देखकर वे लकड़हारे डर गए , उनमें से एक जल्दी से भागकर गाँव में पहूँचा और गाँव वालों को जमा किया। सारा किस्सा सुनकर तुरंत गाँव वाले उसके साथ उस जगह पर चले आये। खड्डा खोदने पर रोहिणी की लाश मिल गई ... सिर्फ कंकाल बचा था। कंकाल पर जो गहने थे, उन्हें देखकर पता चल रहा था कि यह लाश किसी औरत की है। गाँव वाले सोच में पड़ गए कि यह औरत आखिर है कौन? गाँव से बस एक ही औरत लापता थी ... जमींदार वीर सिंह की पत्नी ... रोहिणी। कंकाल पर जो बहुमूल्य गहने थे, वे भी इस बात पुष्टि कर रहे थे कि यह लाश रोहिणी की ही है क्योंकि गाँव में इतना रईस सिर्फ जमींदार का परिवार ही था। गाँव वालों को लगने लगा कि यह वीर सिंह की ही करतूत है, उसी ने अपनी पत्नी को मार के यहाँ दफना दिया और गाँव में उस के बारे में गलत अफवाह फैला दी। गाँव वालों ने तय किया कि वो यह लाश गाँव ले जायेंगे और जमींदार के परिवार को उसका अच्छे से अंतिम संस्कार करने को कहेंगे। वो रोहिणी की लाश लेकर गाँव आये और जमींदार के हवेली के सामने इकट्ठा हुए पर वीर सिंह ने इस बात एक सिरे से खारिज कर दिया कि वो लाश उसकी पत्नी की है। बड़े - बुजुर्गों ने समझाने की कोशिश की पर उसने और उग्र रूप धारण कर लिया ... यह देखकर गाँव वालों की सारी हेकड़ी गुल हो गई। गाँव वालों में वीर सिंह का विरोध करने का तनिक भी साहस था। अंततः उन्होंने गाँव के पंडित के सलाह पर मिल - जुलकर रोहिणी का अंतिम संस्कार कर दिया पर इस अफरातफरी में किसी का ध्यान नहीं गया कि रोहिणी का वो बाजु , जो जमीन से बाहर रह गया था वो घाटी में ही छूट गया ... दरअसल वो बाजु ढुलक कर उसी पेड़ के तले में चला गया था जहाँ रोहिणी वीर सिंह के डर से छिपी थी।
........... और यहीं गलती हो गई गाँव वालों से ............. 

विडम्बना देखो, इधर गाँव वाले रोहिणी का अंतिम संस्कार कर रहे थे और उधर उसका कातिल वीर सिंह मंगला के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा था। मंगला जात की मल्लाहिन थी, उसकी कहानी रोहिणी से कुछ ज्यादा अलग नहीं थी .... कहानी अलग थी तो बस इतनी कि रोहिणी बहुत भोली थी और मंगला सयानी। हुआ यूँ था कि वीर सिंह हीरगंज में मंगला को देखकर उस पर दिवाना हो गया था पर मंगला की माॅं एक धूर्त औरत थी, दुनिया देख रखी थी उसने ... जानती थी कि जमींदारों के ये खेल बस मन भर जाने तक होते हैं इसलिए उसने जमींदार के आगे यह शर्त रख दी कि उसे मंगला से शादी करनी होगी। वीर सिंह पहले बड़ा बिफरा - गरजा - धमकाया पर जब मंगला की माँ टस से मस नहीं हुई आखिर उसे मंगला की कामना में तड़प कर उनकी शर्त माननी ही पड़ी। मंगला किसी और से प्रेम करती थी और यह शादी कत‌ई नहीं करना चाहती थी पर अपनी माँ के आगे उसकी एक न चली। मंगला की माँ जमींदार से अपनी बेटी की शादी सिर्फ इसलिए करवाई थी ताकि मीठी छुरी से उसकी जेब कतरती रहे ... अपनी बेटी के भार बराबर उसके लिए गहने बनवाये उसने जमींदार से। यह देख के भी आॅंखें मुंदे रखती थी कि मंगला ने हवेली के ऐशोआराम में वीर सिंह के नज़रों से बचा के अपने पुराने प्रेमी को भी पाल रखा था। रोहिणी के हत्या की खबर जंगल में आग की तरह फैली और हीरगंज तक पहुँची, जाने क्यों मंगला के कलेजे में हूक सी उठी ... मन उचट सा गया। ऐसे ही एक वक्त में जब वीर सिंह अधरात को उसके प्रेम में डूबा था तो वो अनायास ही बोल उठी, 
" ठाकुर साहब मैंने तो सुना है कि छोटी ठकुराइन ऐसी सुन्दर थी कि हाथ लगाने से मैली हो जातीं फिर मैं क्यों ? उनके बारे में जितना सुन रखा है, लगता है मैं उनके पांवों की मैल बराबर भी नहीं फिर आखिर मेरी जैसी मल्लाहिन क्यों ?? "
रोहिणी के जिक्र मात्र से ही वीर सिंह को वह मखमली बिछौना कांटों की सेज की भांति चुभने लगा ... बिफर पड़ा, खींच कर दो चमाट मंगला के गालों पर धर दीं‌ और चिल्लाया, 
" क्यों री ? तुझे मेरा प्रेम नहीं सोहता क्या ? "
मंगला ने बिलखते हुए मुंह फेर लिया। वीर सिंह का तन - मन ऐसा उचाट हुआ कि वो बहुत रात चढ़े ही हीरगंज से शिवनगर की ओर लौट पड़ा मगर जंगल के पास से गुजरते वक्त बग्घी अचानक से रूक गई  ... जैसे किसी ने घोड़ों का लगाम खींच कर रोक लिया हो। बग्घी के अन्दर वीर सिंह की आॅंख लग ग‌ई थी, तेज झटके से बग्घी रुकने के कारण उसकी नींद खुल गई। उसने कोचवान को फटकारा, 
" क्या कर रहा है रे नन्दु ,इस वीराने में गाड़ी काहे रोक दी?"
दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं आया,ऐसा लग रहा था कि वीर सिंह की आवाज कोचवान तक पहुँच ही नहीं पा रही थी। कोचवान को और फटकारने के नीयत से वो बाहर निकल आया , बाहर घनघोर अँधेरा था और चारों ओर  सन्नाटा पसरा हुआ था ... बाहर पग धरते ही वीर सिंह की नजरों ने जो देखा वह सुन्दर मगर हौलनाक था .... ठीक सामने रोहिणी खड़ी थी, बिल्कुल वैसी ही जैसी उसे वीर सिंह ने पहली बार सुहागरात की सेज़ पर देखा था ... वो वीर सिंह को देख कर मनमोहक ढंग से मुस्कुरा‌ई और मद्धिम चाल से उसकी तरफ बढ़ने लगी ... रुनझुन- रुनझुन पायल बजने लगी ,करीब आकर रोहिणी ने हाथ बढ़ाया और उसके गालों को हल्के से सहलाने लगी पर वो हाथ ... हाथ कहाँ था  ... वो तो कंकाल था, जिससे थोड़ा - बहुत सड़ा हुआ मांस चिपका हुआ था .... धीरे - धीरे रोहिणी का सारा देह ही कंकाल में तब्दील होने लगा  ... जिस्म से मांस गल - गल के टपकने लगा .... वीर सिंह की जान हलक में आ गई, खौफ़ के मारे वीर सिंह बेतहाशा चीखने लगा ... कोचवान को इस बार बराबर उसकी आवाज सुनाई दी पर वह जल्दी से अपने मालिक के करीब पहुँचता उससे पहले ही वो होश खो कर गिर पड़ा और ऐसे तड़पने लगा जैसे मिरगी का भयंकर दौरा पड़ा हो ... रोहिणी का नाम होश खो देने के बाद भी उसके होठों पे चिपका हुआ था। कोचवान पक्की उम्र का हिम्मत वाला आदमी था, वह छोटी ठकुराइन का नाम सुनकर डरा तो जरूर मगर हिम्मत नहीं छोड़ी। उसने बड़ी मुश्किल से ठाकुर साहब को बग्घी में डाला और हवा के रफ़्तार से वहाँ से घोड़ों को ऐसा भगाया कि शिवनगर के हवेली में ही आकर रूका। 

इस गाँव के ... अगल - बगल के जितने नामी वैद्य थे सब एक साथ शिवनगर के हवेली में जमा थे पर कोई ये बता नहीं पा रहा था कि जमींदार वीर सिंह को कौन सा रोग हुआ है। बड़ी ठकुराइन ने कोचवान के मुंह से सारी बातें जान लीं थीं ... चुपचाप एक कोने में सिर पकड़ कर बैठीं हुईं थीं क्योंकि वो जान गईं कि हुआ क्या है ...................... 


क्रमशः...................