An Incomplete Mother - 2 in Hindi Drama by Anjali kumari Sharma books and stories PDF | एक अधूरी मां - 2

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एक अधूरी मां - 2

संघर्ष और ममता की परीक्षा

राधा की ज़िंदगी अब एक नए मोड़ पर थी। सूरज ने अपनी पिछली पत्नियों के साये से राधा को बचाने के लिए ज़मीन-आसमान एक कर दिया। वह राधा को कई मंदिरों में ले गया, झाड़-फूँक करवाई और ढेरों मन्नतें माँगी। सूरज अब राधा को अपनी पत्नी के रूप में अपनाने लगा था क्योंकि वह चाहता था कि उसका घर-संसार फिर से खुशियों से भर जाए। धीरे-धीरे वे साये कम होने लगे, मानो किसी शक्ति ने उन्हें बांध दिया हो। घर में कुछ समय के लिए सुख-शांति लौट आई।

शादी के कुछ साल बीतने के बाद, राधा की कोख हरी हुई और उसने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया। राधा को लगा कि शायद अब उसकी किस्मत बदल जाएगी। लेकिन यह तो बस एक नई जद्दोजहद की शुरुआत थी।
नन्हा बच्चा घर आया तो राधा का पूरा समय और ममता उसी पर न्यौछावर होने लगी। छोटे बच्चे को माँ की ज़रूरत ज़्यादा थी, जबकि सूरज के पहले बच्चे अब थोड़े बड़े हो गए थे और अपना ख्याल खुद रख सकते थे। मगर सूरज को यह रास न आया। जब भी वह काम से घर लौटता, घर में क्लेश शुरू हो जाता। सूरज चिल्लाकर कहता, "तुम सिर्फ अपने सगे बेटे को माँ मानती हो, मेरे इन बच्चों को तुमने कभी अपना नहीं समझा!"


राधा की ममता पर लगा यह आरोप उसे भीतर तक छलनी कर देता। वह दिन-भर घर का काम करती, चार-चार बच्चों को संभालती, फिर भी उसे 'सौतेली' का तमगा दे दिया जाता। आर्थिक तंगी और मानसिक दबाव इतना बढ़ गया कि कई बार राधा के मन में आत्महत्या के विचार आने लगे। वह छत पर खड़ी होकर अंधेरे को ताकती और सोचती कि क्या यही उसका अंत है? पर फिर छोटे से बेटे की मासूम सूरत उसे जीने की वजह दे देती।

बेबस होकर राधा ने अपने मायके फोन लगाया। रोते हुए उसने अपनी माँ से पूछा, "क्या मैं आप पर इतना बोझ थी जो मुझे इस नर्क में धकेल दिया? मैं खुद अभी बच्ची थी और मुझे चार बच्चों की ज़िम्मेदारी थमा दी। न पति समझता है, न बच्चे। दूसरे की बेटियां तो मायके आकर बच्चा पैदा करती हैं, पर मैंने अकेले इस सज़ा को झेला। क्या आपको मेरी याद नहीं आती?"

लेकिन मायके से भी वही घिसा-पिटा जवाब मिला— "बेटी, जो नसीब में लिखा है उसे कोई नहीं बदल सकता। अब वही तुम्हारा घर है, उसे ही स्वर्ग बनाओ।"
राधा समझ गई कि वह इस दुनिया में बिल्कुल अकेली है। पड़ोस की औरतें उसे समझातीं कि मर्दों का गुस्सा तो झेलना ही पड़ता है, यही एक भारतीय नारी की नियति है। राधा चुपचाप अपनी किस्मत के आँसू पीकर रह जाती।

एक रात, घर का क्लेश अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। सूरज ने गुस्से में राधा का हाथ मरोड़ दिया और उसे घर से निकल जाने को कहा। राधा अपने छोटे बेटे को सीने से लगाकर घर के बाहर ठिठुरती ठंड में खड़ी रही। तभी उसके पीछे से एक नन्हा हाथ उसकी साड़ी के पल्लू को पकड़ता है।

राधा पीछे मुड़कर देखती है—वह सूरज का सबसे बड़ा सौतेला बेटा था। उसकी आँखों में नफरत नहीं, बल्कि एक अजीब सा दर्द था। उसने चुपके से अपने हाथ में पकड़ी हुई रोटी की एक सूखी टुकड़ी राधा की तरफ बढ़ाई और धीमी आवाज़ में कहा, "रो मत छोटी माँ... बाबूजी गुस्सा हैं, पर हम भूखे हैं।"


क्या इस मासूम की पुकार राधा के भीतर की 'सौतेली माँ' की कड़वाहट को मिटा पाएगी? क्या सूरज को कभी अपनी गलती का एहसास होगा, या राधा का यह संघर्ष उसे किसी ऐसे रास्ते पर ले जाएगा जहाँ से लौटना मुमकिन नहीं?